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आज है सतुआन, बिहार और भोजपुर का लोक पर्व

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हिंदुओं का चैत्र मासिक पर्व मेष संक्राति (सतुआन) रविवार को मनाया जाएगा. मेष राशि पर सूर्य रविवार को चला जाएगा. सूर्य के मेष पर आने पर ही सतुआन मनाने की महत्ता है. आज से सतुआन और बंगला नव वर्ष 1427 प्रारम्भ हो रहा है. बंगाल मे इसे पोइला बैशाख, चडक पूजा कहा जाता है. इसी दिन तमिल नववर्ष, केरल में विशु, उडीसा में मेष संक्राति, मणिपुर मे चेइरोबा, सती अनुसूया जयंती के रूप में मनाई जाती है. इसी के साथ खरमास की समाप्ति हो जाऐगी.

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सतुआन भोजपुरी संस्कृति के काल बोधक पर्व है. हिन्दू पतरा में सौर मास के हिसाब से सूरज जिस दिन कर्क रेखा से दक्षिण के ओर जाता है उसी दिन यह पर्व मनाया जाता है. बिहार में इस पर्व को खास तरीके से मनाया जाता है. इस दिन लोग गंगा में स्नान करते हैं और दान पुन्य का काम करते हैं.

सनातन धर्म में मेष संक्रांति का बड़ा महत्व है.आज के दिन शीतल जल में स्नान का बड़ा महत्व है. मान्यता है कि शीतल जल में स्नान करने से गिरगिट व सर्प योनि में जन्म लेने से मुक्ति मिलती है. आज के दिन ब्राह्मणों को घड़ा के साथ सतुआ दान का विशेष महत्व है. इसके साथ शिवालयों में शिवलिंग के उपर घड़ा से जल गिराने का कार्य किया जाता है. मुख्य रूप से सत्तू, गुड़, चना, पंखा, मिट्टी का घड़ा, आम, ऋतुफल, अन्न दान करें. वैसे तो मान्यता यह भी है कि सत्तू व जल से भरे पात्र का दान करने से सभी पापों का नाश हो जाता है.

बुजुर्ग व्यक्ति ने Ashwini Kumar Chaubey को खरी खोटी सुना कर दिया पानी-पानी

बुजुर्ग व्यक्ति ने Ashwini Kumar Chaubey को खरी खोटी सुना कर दिया पानी-पानी #ashwini kumar chaubey https://youtu.be/mConvl8ETFo

Bihari Mati यांनी वर पोस्ट केले शनिवार, १३ एप्रिल, २०१९

इस पर्व को सतुआन के अलावा सत्तू संक्रांति भी कहते हैं. पंजाब में इसे वैशाखी त्योहार के रूप में मनाया जाता है. आज से ही बांग्ला नव वर्ष की शुरुआत हो गयी है. आज से मांगलिक कार्य का शुभारंभ हो गया है. चूंकि सूर्य उच्च राशि में प्रवेश कर गए हैं. अत: खरमास की समाप्ति हो गयी है. दूसरे महीनों की अपेक्षा इस महीने सूर्य ज्यादा प्रभावशाली होंगे. सूर्य का उच्च राशि में प्रवेश शुभ फलदायी है.

महाभारत के वन पर्व के अनुसार तब का काम्यक वन आज का बिहार में ककोलत है. पांडवों का अज्ञातवास यहीं हुआ था. तब भगवान श्री कृष्ण का यहां आगमन हुआ था. ऋषि दुर्वासा को यहीं शिष्यों के साथ कुंती ने सूर्य के दिये पात्र में भोजन बनाकर खिलाया था तथा श्राप देने से रोका था. इसके साथ ही मां मदालसा ने यहीं अपने पति को कुष्ठ रोग से मुक्ति दिलाई थी. दुर्गा सप्तशती की रचना यहीं ऋषि मार्कण्डेय ने की थी .  मगध में ककोलत की अपनी पहचान है.

17 मिनट के इस VIDEO को सुने लालू परिवार कैसे परेशान था TEJ PRATAP की तलाक की खबर सुनकर

17 मिनट के इस VIDEO को सुने लालू परिवार कैसे परेशान था TEJ PRATAP की तलाक की खबर सुनकर #LOKSHABHAELECTION2019 #JDU #NEERAJKUMAR #LALUYADAV

Bihari Mati यांनी वर पोस्ट केले शुक्रवार, १२ एप्रिल, २०१९

इस अवसर पर स्थानीय लोग स्नान के बाद ब्राह्मणों को सतुआ दान कर सतुआ व आम का टिकोला खाते हैं. आसपास के गांवों के साथ ही पूरे प्रखंड में किसी के घर चुूल्हा नहीं जलता तथा घर आए मेहमानों को भी सतुआ का भेाजन परोसा जाता है. वहीं यह भी मान्यता है कि इस दिन पितरों को सन्तुष्ट करने के लिए सत्तू, गुड़, चना, पंखा, मिट्टी का घड़ा, आम, फल आदि का दान पंडितों के बीच किए जाने की परम्परा है.

इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि गर्मी के दिनों में सूर्य की तपिश से शरीर का पित्त कुपित हो जाता है. इससे निजात पाने के लिए आम के टिकोरे की चटनी सत्तू के साथ सेवन करने से धूप का असर कम होता है. इसी क्रम में लोग आम का पन्ना भी पीकर भी सूर्य की गरमी से होने वाले दुष्प्रभाव को दूर करते हैं.

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बैशाखी पर्व मनाने की क्या है परंपरा और महत्व

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सिख समुदाय का महत्वपूर्ण पर्व बैशाखी 13 और 14 अप्रैल को मनाई जाएगी. बैशाखी का त्योहार फसलों के तैयार होने और खालसा पंथ की स्थापना के रूप में मनाई जाती है. आइए जानते हैं बैशाखी पर्व का महत्व.

आज है सतुआन, बिहार और भोजपुर का लोक पर्व

खालसा पंथ की हुई थी स्थापना
जिस कारण बैसाखी को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है वह खालसा पंथ की स्थापना है. गुरु गोबिंद सिंह ने सन 1699 में इसी दिन आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की नींव रखी थी. पंथ की स्थापना का उद्देश्य समाज को शासकों के अत्याचारों से मुक्त कर उनके जीवन को श्रेष्ठ बनाना था. सिख पंथ के प्रथम गुरु नानकदेव ने भी वैशाख माह की आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से काफी प्रशंसा की है, इसलिए पंजाब और हरियाणा सहित कई क्षेत्रों में बैसाखी मनाने के आध्यात्मिक सहित तमाम अन्य कारण भी हैं. गुरु गोबिंद सिंह ने गुरु के बलिदान के बाद, धर्म की रक्षा के लिए बैसाखी के दिन अलग-अलग जातियों, धर्मों और क्षेत्रों से चुनकर पंच प्यारों को अमृत छकाया.

बैसाखी का हिन्दू धर्म से संबंध
अधिकांश पर्व-त्योहार मौसम, मौसमी फसल और उनसे जुड़ी गतिविधियों से ही संबंधित हैं. भारत में महीनों के नाम नक्षत्रों पर रखे गए हैं। बैसाखी के समय आकाश में विशाखा नक्षत्र होता है. विशाखा नक्षत्र पूर्णिमा में होने के कारण इस माह को वैशाख कहते हैं. इस प्रकार वैशाख मास के पहले दिन को बैसाखी कहा गया है और पर्व के रूप में माना गया है.

बैसाखी का महत्व
बैसाखी अप्रैल में तब मनाया जाता है, जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है. इसी समय सूर्य की किरणें गर्मी का आगाज करती हैं. इन किरणों के प्रभाव से जहां रबी की फसल पक जाती है, वहीं खरीफ की फसल का मौसम शुरू हो जाता है. इस पर्व की धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यता भी काफी है. लोग देवी-देवताओं की पूजा करते हैं. पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तरी राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जहां बैसाखी के रूप में उल्लास का रंग दिखता है, तो उत्तर-पूर्वी भारत के असम आदि राज्यों में बिहू पर्व मनाया जाता है.

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रामनवमी पर विशेष- राम का चरित्र हम सबका आदर्श: आचार्य व्यंकटेश शर्मा

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भगवान राम का जन्म त्रेता युग के चैत शुक्ल नवमी यानि रामनवमी को हुआ. हमारे मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि आखिर राम ही हम सबको इतने प्रिय क्यों हैं? हम लोगों का मानना है कि राम पतित पावन हैं, शोक नसावन हैं, भक्तों के रक्षक एवं उद्धारक हैं, लेकिन ये तो परमात्मा के हर अवतार के गुण हैं. इसमें राम की विशिष्टता कहा बनती है?
इन पंक्तियों से समझे—

प्रश्न नहीं है इस दुनिया में कौन कितना बड़ा है।
प्रश्न यही है किस जमीन पर कैसे कौन खड़ा है।।

राम अन्य देवी देवताओं की तरह नहीं हैं, वे मनुष्यों की भांति जीते हैं, दुख दर्द झेलते हैं, हंसते हैं, रोते हैं. साधारण व्यक्ति की तरह जीते हुए असाधारण बन जाते हैं यानी नर से नारायण. उन्होंने अपने आचरण में घोर विपत्तियों को सहते हुए पारिवारिक-सामाजिक उदात्त मूल्यों को जिया जो राम की विशिष्टता को रेखांकित करता है. कवि की पंक्तियां हैं—

त्याग दी सब ख्वाहिशें, निष्काम बनने के लिए
तीन पहरों तक तपा दिन, शाम बनने के लिए
घर नगर परिवार मां की ममता प्यार दुलार
राम ने खोया बहुत कुछ, राम बनने के लिए।

राम ने जिन आदर्शों को जीया, उन्हें तोड़ने वाले को जनसाधारण के मन ने कभी क्षमा नहीं किया चाहे वह कैकेयी हो या विभीषण. आज भी कोई अपने बेटे-बेटी का नाम साधारणत: कैकेयी या वि​भीषण नहीं रखता है. राम का नाम हमारे मन में रचा-बसा है तभी तो हम लोग मिलन-बिछोह में “राम-राम”, दुख-दर्द में “हाय राम”, डर या मौत का सामना करते हुए “हे राम” तथा मृत्युपरांत “राम नाम सत्य है” कहना हमारी आदत बन गयी है. इसलिए राम का चरित्र हम सबका आदर्श है. उनके जैसा उदात्त जीवन जीने का संकल्प आज भी मानवता के लिए पाथेय बना हुआ है. किसी कभी ने राम का वर्णन करते हुए लिखा है—

राम व्यक्ति को नहीं, व्यक्ति को प्राप्त हुई संज्ञा हैं
राम हमारा चिंतन, दर्शन, प्रीति, प्रकृति, प्रज्ञा हैं
राम चिरंतन जीवन मूल्यों का स्वर्णाभ शिखर हैं
राम हमारी संस्कृति का सारस्वत हस्ताक्षर हैं
राम हमारा कर्म, हमारा धर्म, हमारी गति हैं
राम हमारी शक्ति, हमारी भक्ति, हमारी मति हैं
बिना राम के आदर्शों का चरमोत्कर्ष कहां है,
बिना राम के इस भारत में भारतवर्ष कहां हैं!

आज के इस भौतिकवादी युग में भी राम की बहुत जरूरत है. वर्तमान में परिवार टूट रहे हैं. उससे पार पाने के लिए राम सबसे उपयुक्त है. राम ने स्वयं घर नहीं छोड़ा बल्कि घर के प्रति सदैव समर्पित रहे. उन्होंने घर परिवार में रहकर संबंधों में जीते हुए जीवन की उंचाइयों को प्राप्त किया. परिवार ही उनका वास्तविक कर्म क्षेत्र रहा. उनका शायद यह मानना रहा होगा कि इसे ठीक से जीओ तो जीवन उठता है, इसमें उपद्रव होता है तो जीवन मिटता है. इसलिए राम ने अपने आचरण से परिवार के हर संबंध को गौरव एवं गरिमा दी जो आज भी हमारे लिए अनुकरणीय है. आचार्य विष्णुकांत शास्त्री की पंक्तियां हैं—

बहुत कठिन है राम, जगत में राह तुम्हारी चलना।
कहना सुगम, निभाना दुर्गम, कैसी—कैसी छलना।।

पहले तो लोग संयुक्त परिवार में रहना चाहते थे, परिवार से अलग होने में दुखी होते थे. आज अलग के लिए भगवान से प्रार्थना करते है. इस कामना ने उनका दुख भी बढ़ा दिया है. तलाक बढ़ रहे हैं, तनाव बढ़ रहे हैं, पति-पत्नी में तकरार बढ़ रही है. ऐसे में इस कहावत को उलट कर चरितार्थ करने की आवश्यकता है, जाहि विधि राखे राम, ताही विधि रहिए के बजाय जाहि विधि रहे राम, ताहि विधि रहिए कि प्रेरणा से अपने जीवन को संवारना होगा.

जीवन में किसी लक्ष्य का न होना ही दरिद्रता है. परंतु केवल धन दौलत की प्रगति भी हमारी समृद्धि नहीं हो सकती. समृद्धि तो तभी कही जा सकती है जब हम इस प्रगति को अपनी शाश्वत परंपराओं से जोड़कर प्राप्त करें जो स्वयं राम ने किया. जीवन जीने के लिए केवल अर्थ और काम पर्याप्त नहीं है. अर्थ और काम व्यक्ति के जीवन को धर्मपूर्वक चलाये और राम तक पहुंचाएं तभी जीवन धन्य है

बुजुर्ग व्यक्ति ने Ashwini Kumar Chaubey को खरी खोटी सुना कर दिया पानी-पानी

बुजुर्ग व्यक्ति ने Ashwini Kumar Chaubey को खरी खोटी सुना कर दिया पानी-पानी #ashwini kumar chaubey https://youtu.be/mConvl8ETFo

Bihari Mati यांनी वर पोस्ट केले शनिवार, १३ एप्रिल, २०१९

आज की परिस्थितियों में भगवान राम के जीवन का यह प्रसंग भी बहुत प्रेरणादायक है. जब गुरु विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को अपने यज्ञ की सुरक्षा हेतु ले जा रहे थे तो रास्ते में ताड़का की गर्जना सुनकर राम ने धनुष पर तीर चढ़ाया किंतु अपने सामने एक नारी को खड़े देखकर उन्होंने प्रत्यंचा ढीली कर ली. राम से ऐसा करने पर विश्व​मित्र ने जब पूछा तो उन्होंने कहा कि वह नारी है. इसपर गुरुवर ने समझाया कि वह नारी तो हैं किंतु उसके पीछे उसका छुपा राक्षसी चरित्र भी तो है इसलिए वह दंडनीय है, अन्यथा वह अभी हम सबको मार देगी. तब राम ने उसका वध किया.

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आतंकवाद एवं राष्ट्र विरोधी कार्यों में संलग्न मानव के छुपे चरित्र को ध्यान में रखते हुए राष्ट्र एवं संस्कृति की रक्षा के लिए हमें सजग रहना होगा. राम का आचरण एवं व्यवहार संबंधों में जीवन जीने की पराकाष्ठा है. इसलिए मनुष्य जबतक संबंधों में जीता रहेगा, हमारी संस्कृति के प्रतीक राम सदैव उसके लिए पाथेय बने रहेंगे और हम गर्व के साथ कह सकेंगे-क्या बता है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।

लेखक
आचार्य व्यंकटेश शर्मा
काशी वेद वेदांग विद्यापीठ,वाराणसी 
प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य एवं समाजसेवी

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Ramnavmi: 13 अप्रैल को, बन रहा सर्वश्रेष्ठ नक्षत्र

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चैत्र शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को नवरात्रि अष्टमी तिथि मनाई जाती है. वहीं चैत्र शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को नवमी तिथि को रामनवमी मनाई जाती है. इस दिन कन्याओं का पूजन कर नवरात्रि के नौ दिनों के व्रत का पारण किया जाता है. इस बार नवमी तिथि 13 अप्रैल की सुबह 8.19 बजे से 14 अप्रैल की सुबह 6.04 बजे तक है. इसलिए 13 अप्रैल दिन शनिवार को महानवमी का व्रत होगा.

इस बार राम नवमी पुष्य नक्षत्र के योग में है. पुष्य नक्षत्र सभी 27 नक्षत्रों में सबसे सर्वश्रेष्ठ नक्षत्र माना गया है. भगवान राम का जन्म पुष्य नक्षत्र में हुआ था.  वहीं 12 अप्रैल 2019 दिन शुक्रवार को सुबह 10:18 बजे से 13 अप्रैल दिन शनिवार को सुबह दिन में 08:16 बजे तक अष्टमी तिथि होगी उसके बाद नवमी तिथि लग जाएगी. 13 अप्रैल दिन शनिवार को महानवमी का व्रत होगा क्योंकि 13 अप्रैल को सुबह 08:16 बजे के बाद ही नवमी तिथि लग जाएगी जो 14 अप्रैल की सुबह 6 बजे तक ही विद्यमान रहेगी.

MUST READ: बिहार का ब्राह्मण महासंघ BJP से नाराज, जानें विरोध की वजह

अतः नवमी तिथि में ही नवरात्र सम्बंधित हवन -पूजन 14 अप्रैल को प्रातः 06:00 बजे के पूर्व किसी भी समय किया जा सकता है. नवरात्र का पारण दशमी तिथि 14 अप्रैल दिन रविवार को प्रातः काल 6 बजे के बाद किया जाएगा. साथ ही 13 अप्रैल दिन शनिवार को मध्यान्ह नवमी तिथि होने के कारण प्रभु श्री राम की जयतीं यानी रामनवमी का पुण्य पर्व भी मनाया जाएगा.

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