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लालू-राबड़ी शासन में जनता को मिले इन सौगातों को पढ़ ले तेजस्वी जी : आचार्य व्यंकटेश शर्मा

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भारत की राजनीति बड़ी अजब गजब है. हमारे देश में लोकतांत्रिक प्रणाली है. लोकतंत्र अर्थात जनता द्वारा जनता के लिए चुना गया शासन. लोकतंत्र भी ऐसा जिसमें देश के सर्वोच्च पद के लिए चुने गए व्यक्ति को गाहे बगाहे आरोपित करने का अधिकार आपको मिल गया है. यानि देश के प्रधानमंत्री हो या राज्य के मुखिया अपशब्द आप जब चाहे उन्हें बोल सकते है. ऐसा ही कुछ बीड़ा विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने उठा रखा है. कइयों घोटालों में फंसा परिवार राजतंत्र की बात करें तो वे उसे शोभा नहीं देती. समाज, अपराध, आरक्षण, बेरोजगारी, रोजगार की बातों को वह किताबों में पढ़कर जनता के बीच लेकर पहुंचे. कभी वह सड़क की निंदा करता है तो कभी अपराध और बेटियों के अस्मत की.

परंतु वे भूल गया है कि वह खुद गुनेहगार है भोली-भाली जनता के साथ छलावा करके. उसके पिता के कृत्यों ने बिहार की पहचान ‘जंगल राज’ के रूप में करा दी. अब अपने पिता को महात्मा बुद्ध बताते फिर है. जिसे बिहार की जनता अब मानने वाली नहींं है. यह कहना है स्नातक चेतना मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य व्यंकटेश कुमार शर्मा का. समाजसेवी श्री शर्मा ने तेजस्वी यादव के आरक्षण बढ़ओ और बेरोजगारी हटाओ का नारा बुलंद कर जनता को गुमराह कर रहे हैं. यदि उनके माता-पिता यानि लालू-राबड़ी शासन के दौरान 1990 से 2005 के बिहार के हालात पर नजर डाल कर देखें. नजरिया साफ हो जाएगा. यदि नहीं तो तेजस्वी जी को लालू-राबड़ी शासन में ‘जंगल राज’ की कुछ झलकियां… याद करा देते हैं.

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किडनैपिंग बन गई इंडस्ट्री : दरअसल, जंगल राज से मतलब नेताओं, नौकरशाहों, व्यापारियों, अपराधियों के आपराधिक सांठगांठ से है. लालू-राबड़ी के शासन में भी ऐसे ही नेक्सस बने थे. बिहार का चप्पा-चप्पा अपहरण, हत्या, बलात्कार, चोरी, डकैती, रंगदारी, भ्रष्टाचार आदि की घटनाओं से लबरेज था. विरोधियों ने तो यहां तक कह दिया कि लालू-राबड़ी के शासन में किडनैपिंग को उद्योग का दर्जा मिल गया. जब जिसे जैसे इच्छा होती थी, बेरोकटोक किसी को उठा लेता था. खासकर, डॉक्टर, इंजिनियर और बिजनसमैंन अपहरणकर्ताओं के निशाने पर रहते थे. इन्हें दिनदहाड़े उठा लिया जाता था और ऐसी घटनाएं करीब-करीब रोज ही सामने आतीं. द टाइम्स ऑफ इंडिया की ओर से तब करवाए गए एक सर्वे से पता चला कि साल 1992 से 2004 तक बिहार में किडनैपिंग के 32,085 मामले सामने आए. कई मामलों में तो फिरौती की रकम लेकर भी बंधकों को मार दिया जाता था.

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खून से लाल हुआ था बिहार: बिहार पुलिस की वेबसाइट के मुताबिक, साल 2000 से 2005 की पांच साल की अवधि में 18,189 हत्याएं हुईं. इस आंकड़े को ध्यान में रखकर कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि 15 सालों में 50 हजार से ज्यादा लोग मौत के घाट उतार दिए गए. हैरानी की बात यह है कि सिर्फ घोषित अपराधी ही मर्डर नहीं किया करते बल्कि सांसदों-विधायकों के इशारों पर भी हत्याएं होती थीं. सीवान के सांसद शहाबुद्दीन की करतूतों को भला कौन भूल सकता है.

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जातीय हिंसा का दौर: लालू-राबड़ी के राज में बिहार जातीय हिंसा की आग में झुलस गया था.नक्सली वारदातों का जवाब देने के लिए अगड़ी जातियों और खासकर भूमिहारों ने रणबीर सेना का गठन किया. इन दोनों संगठनों ने एक-एक बार में सैकड़ों लोगों की हत्याएं कर बिहार की धरती को रक्तरंजित कर दिया था. भोजपुर के सहार स्थित बथानी टोला नरसंहार हो या जहानाबाद के अरवल स्थित लक्ष्णपुर बाथे कांड अथवा अरवल के ही शंकरबिगहा कांड, इन नरसंहारों को कोई भुला नहीं सकता. बिहार में जातीय हिंसा का अंत 16 जून, 2000 को औरंगाबाद जिले के गोह प्रखंड के मियांपुर गांव में हुए नरसंहार से माना जा सकता है. इस घटना में यादव जाति के 33 लोग मारे गए थे. रणबीर सेना की ओर से हर कार्रवाई का जवाब देनेवाले नक्सलियों ने इस पर कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की थी.

राजनीति का अपराधीकरण: लालू-राबड़ी शासन में शहाबुद्दीन, सूरजभान, पप्पू यादव जैसे कई नेताओं का अपने-अपने इलाके में आतंक व्याप्त था. उनका कहना कानून था, उनका आदेश ही शासन है. पटना में रीतलाल यादव के आतंक को भला कौन भूल सकता है. रीतलाल अभी विधानपरिषद के सदस्य हैं. पटना सीट उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जेडी (यू), आरजेडी और बीजेपी के प्रत्याशियों को पीछे छोड़ दिया. उन पर अब भी दर्जनों संगीन मामले दर्ज हैं.

खूब फला-फूला तबादला उद्योग: लालू-राबड़ी के शासन में नौकरशाहों और अधिकारियों के हाथ-पांव फूले रहते थे, यह सोचकर कि ना जाने कब ट्रांसफर ऑर्डर आ जाए. कई बार तो आधी रात को ट्रांसफर ऑर्डर निकाल दिया जाता था. अधिकारी जब सुबह अखबार पढ़ते तो पता चलता कि उनका ट्रांसफर फलां जगह हो गया है. वे दौड़े-भागे अपने-अपने आका के पास पहुंचते और ट्रांसफर रुकवाने के लिए भारी नजराना पेश करते. इससे पूरा शासन-प्रशासन अस्थिर हो गया.

जाति की राजनीति: लालू यादव को सामाजिक न्याय के प्रतीक पुरुष के रूप में देखा जाता है. लेकिन, सच्चाई यह भी है कि उन्होंने दलितों और कमजोर वर्ग के लोगों को आवाज देने के लिए तथाकथित उच्च जातियों पर जुल्म किए. लालू पर जाति की राजनीति को परवान चढ़ाने का भी आरोप लगता रहा है. इस आरोप के समर्थन में लोग लालू के ‘हमको परवल बहुत पसंद है, भूरा बाल साफ करो’ जैसे जुमले याद दिलाते हैं. परवल का पूरा-पूरा मतलब पाण्डेय यानी ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य यानी बनिया और लाला से लगाया जाता है, वहीं भूरा का मतलब भूमिहार और राजपूत से और बाल से तात्पर्य ब्राह्मण और लाला जाति से लगाया जाता है.

साहब-बीबी और गैंगस्टर: कहा जाता है कि लालू-राबड़ी के शासन में राबड़ी के भाइयों साधु यादव और सुभाष यादव ने आतंक मचा रखा था. साल 2001 में लालू के साले साधु और उनके आदमियों ने आईएएस ऑफिसर एनके सिन्हा से बंदूक की नोंक पर एक ऑर्डर पास करवाया था. अभी दोनों ही लालू से अलग हैं. सुभाष तो पप्पू यादव से जा मिले हैं.

मातहत अधिकारियों के खिलाफ मंत्रियों की साजिश: लालू-राबड़ी शासन में खाद्य और उपभोक्ता मंत्री पूर्णमासी राम, संस्कृति मंत्री अशोक सिंह जैसे कई मंत्रियों ने अपने ही विभाग के अधिकारियों के खिलाफ साजिश रची और उन्हें अपने इशारों पर नचाया. नतीजतन, अधिकारियों का मनोबल चूर हो गया और वे मंत्रियों-नेताओं के सामने समर्पण करने पर मजबूर हो गए. इसका असर बिहार के शासन-प्रशासन पर पड़ा. अधिकारी उचित फैसला नहीं ले सकते थे और नेताओं-मंत्रियों के इशारे पर अन्याय होता था.

विकास में फिसड्डी हुआ बिहार: लालू-राबड़ी के शासनकाल में विकास के मामले में बिहार की स्थिति जर्जर हो गई. नए उद्योग-धंधे लगने की बात तो दूर, पहले से चल रहे उद्योग भी बंद हो गए. रोजगार के लिए लोगों को दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ा. शिक्षा की हालत ऐसी कर दी गई कि आज भी बिहार इससे पूरी तरह से उबर नहीं पा रहा है. लालू कहा करते थे, डॉक्टर, इंजिनियर तो अमीर लोग के बेटा-बेटी बनता है, गरीब तो चरवाहा बनता है. इसलिए लालू ने चरवाहा विद्यालय खोल दिया. इन चरवाहा विद्यालयों का मकसद क्या था, इनमें कौन सी पढ़ाई पढ़ाई जानी थी, इसका अंदाजा आज भी नहीं लगाया जा सका. हां, इन स्कूलों के नाम पर जारी फंड में भरपूर भ्रष्टाचार हुआ. शिक्षा की बदतर हालत ने बिहार के युवाओं को राज्य से बाहर जाने को मजबूर कर दिया. यही हालत सड़कों की थी. तब एक कहावत मशहूर हो गई कि बिहार की सड़कों में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़कें, ये पता नहीं चल पाता.

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घोटालों की बाढ़: यूं तो लालू ने खुद को ‘गुदड़ी का लाल’ के रूप में पेश किया और इसी शीर्षक से स्कूलों की पाठ्य पुस्तक में एक अध्याय भी जुड़वाया गया था, जिसमें उनके जीवन संघर्ष का बखान किया गया और उन्हें गरीबों के मसीहा के तौर पर पेश किया गया. लेकिन, हकीकत यह है कि सत्ता मिलते ही लालू ने उन्हीं गरीबों की हकमारी कर घोटाले किए. गरीबों की कल्याणकारी योजनाओं के पैसे डकार गए, चारा घोटाले पर तो आज भी उन्हें तीखे जुमलों का सामना करना पड़ता है. लेकिन, कहते हैं ना कि न्याय तो होता ही है, भले ही थोड़ी देर से हो. आज लालू प्रसाद यादव चुनाव भी नहीं लड़ सकते. इसलिए, अपने दोनों बेटों को राजनीति के मैदान में उतार चुके हैं.

कुल मिलाकर लालू प्रसाद यादव के शासन की ऐसी कहानियों का कोई अंत नहीं. मुझे याद है कि जब अपनी निरक्षर पत्नी राबड़ी देवी को लालू ने बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया तो हमारे गांव के एक प्रोफेसर ने बातों-बातों में कहा था, ‘लगता है पढ़-लिख कर गुनाह कर दिया. बताइए, मेरी मालकिन एक निरक्षर महिला है.’ तो लालू-राबड़ी शासन के दौरान बिहार में हताशा का ऐसा माहौल था. इस बार चुनाव भी चुनाव प्रचार में उनके पुत्र ने यह कहकर अपनी मंशा साफ कर दी है कि यह चुनाव अगड़ी जातियों के खिलाफ लड़ाई है. क्यों वे सवर्ण आरक्षण के विरुद्ध आरक्षण बढ़ाओं की जनसभा कर जनता को जात-पात की लड़ाई में फंसाकर पिता के बताए रास्ते पर अग्रसर हो गए है.

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30 साल के हुए तेज प्रताप यादव, बधाई देनेवालों का लगा तांता

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RJD अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव आज 30 साल के हो गये. तेज प्रताप यादव के 30वें जन्मदिन पर उन्हें बधाई देनेवालों का तांता लग गया. पार्टी के बड़े नेताओं समेत कार्यकर्ताओं और छात्र आरजेडी के सदस्यों ने उन्हें जन्मदिन की बधाई दी.  जानकारी के मुताबिक, तेज प्रताप यादव अपना जन्मदिन राजधानी के स्ट्रैंड रोड स्थित अपने सरकारी आवास पर मनायेंगे.

बताया जाता है कि तेज प्रताप यादव ने जन्मदिन को लेकर मां राबड़ी देवी, भाई तेजस्वी यादव, बहन मीसा भारती सहित अन्य लोगों को आमंत्रित किया है. तेज प्रताप यादव ने 29वां जन्मदिन अनोखे तरीके से सेलिब्रेट किया था. वह राजधानी पटना के यारपुर नीमचक स्थित दलित बस्ती में केक काटा और महादलित बच्चों के साथ खुशियां बांटी थी.

जन्मदिन मनाने के बाद सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीर शेयर करते हुए तेज प्रताप ने लिखा था कि इस समाज मे कोई बड़ा और छोटा नहीं है. गरीबों के बीच जन्मदिन मनाने में मुझे आनंद आता है, बच्चों में भगवान बसते हैं. तेजप्रताप यादव को उनके छोटे भाई और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने भी बर्थ डे विश किया. बड़े भाई को बर्थ डे विश करने के बाद वो चुनाव प्रचार के लिए रवाना हुए.

राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी ने भी तेजप्रताप यादव को जन्मदिन की बधाई दी है. तिवारी ने उनके सदैव खुशहाल रहने की कामना की है. तिवारी ने बधाई देते हुए उनसे लालू यादव और राबड़ी देवी के बताए रास्ते पर चलने की अपील की.  बता दें कि पिछले साल तेजप्रताप यादव के जन्मदिन के दो दिन बाद ही उनकी सगाई भी हुई थी. तब तेजप्रताप ने कहा था कि ऐश्वर्या ने उन्हें जन्मदिन की बधाई दी है. उन्होंने कहा कि उनका फोन आया था और उन्होंने जन्मदिन की बधाई दी है.

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राजीव प्रताप रूडी ने किया सारण से नॉमिनेशन, हलफनामे में दिया अपनी संपत्ति का ब्यौरा

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बिहार के सारण संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के टिकट पर राजीव प्रताप रूडी ने सोमवार को नामांकन पत्र दाखिल किया. चुनाव आयोग को दिये हलफनामे में रूडी ने अपनी संपत्ति का विवरण भी दिया है. जिसके मुताबिक, उनके ऊपर न्यायालय में कोई भी मामला दर्ज नहीं है. वहीं आय की बात करें तो वर्ष 2014-15 में आईटीआर के अनुरूप 11 लाख 40 हजार 144 रुपये थी, जो कि 2017-18 में बढ़कर 68 लाख 953 रुपये हो गई है.

वहीं, उनकी पत्नी नीलम प्रताप सिंह की कमाई 2014-15 में 57 लाख दो हजार 845 रुपये थी, जो वर्ष 2017-18 में बढ़कर 59 लाख पांच हजार 398 रुपये हो गई है. रूडी के पास दो इनोवा और एक अम्बेस्डर कार है. वहीं, पैतृक गांव में करीब 55 बीघा 11 कट्‌ठा और तीन धूर जमीन है. इसके अलावा पटना में 4 चार कट्‌ठा जमीन है. वहीं, उनकी पत्नी नीलम सिंह के पास मध्यप्रदेश के जबलपुर में .200 हेक्टेयर जमीन है.

हलफनामे के अनुसार रूडी के पास करीब 245 ग्राम और पत्नी के पास 735.2 ग्राम आभूषण है. इस प्रकार उनकी कुल संपत्ति 91 लाख 73 हजार 115.24 रुपये और पत्नी के पास 58 लाख 61 हजार 937.08 रुपए है. सोमवार को राजीव प्रताप रूडी सारण जिला अधिकारी कार्यालय पहुंचे और नामांकन का पर्चा दाखिल किया.

इस दौरान उनके साथ उनकी पत्नी नीलम प्रताप, बेटी अतिशा और बेटे भी साथ थे. इससे पूर्व बीजेपी प्रवक्ता रूडी शहर के गांधी चौक से रोड शो करते जिला अधिकारी कार्यालय पहुंचे. इस मौके पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के कई नेता मौजूद रहे.

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लोकसभा चुनाव : छठे चरण के लिए आज से शुरू होगा नामांकन, दूसरा चरण का आज थम जायेगा प्रचार का शोर

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बिहार में दूसरे चरण में होनेवाले मतदान के लिए चुनाव प्रचार का शोर आज शाम छह बजे से थम जायेगा. दूसरे चरण में किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया, भागलपुर और बांका लोकसभा सीटों के लिए मतदान होना है. वहीं, बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से आठ सीटों के लिए छठे चरण में 12 मई को होनेवाले चुनाव के लिए आज अधिसूचना जारी होते ही नामांकन प्रक्रिया शुरू हो जायेगी. छठे चरण में बिहार के बाल्मीकि नगर, पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, शिवहर, वैशाली, गोपालगंज, सीवान और महाराजगंज में मतदान होना है.

दूसरे चरण में किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया, भागलपुर और बांका सीटों के लिए होनेवाले मतदान के लिए चुनाव प्रचार का आज आखिरी दिन है. दूसरे चरण के लिए 18 अप्रैल को होनेवाले मतदान के लिए आज शाम को किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया, भागलपुर और बांका लोकसभा सीटों के लिए चुनाव प्रचार का शोर थम जायेगा. दूसरे चरण की पांचों लोकसभा सीटों पर कुल 68 उम्मीदवार मैदान में हैं.

इनमें कटिहार से तारिक अनवर और जदयू के दुलालचंद गोस्वामी, पूर्णिया से सांसद संतोष कुशवाहा और कांग्रेस के उदय सिंह, बांका से राजद सांसद जयप्रकाश यादव, जदयू के पूर्व सांसद गिरिधारी यादव और निर्दलीय पुतुल देवी, भागलपुर से राजद सांसद बुलो मंडल और जदयू के अजय मंडल और किशनगंज से कांग्रेस के मो जावेद और जदयू के अशरफ शामिल हैं.

बिहार की बाल्मीकि नगर, पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, शिवहर, वैशाली, गोपालगंज, सीवान और महाराजगंज लोकसभा सीटों के लिए आज अधिसूचना जारी होते ही नामांकन प्रक्रिया शुरू हो जायेगी. छठे चरण के लिए उम्मीदवार 23 अप्रैल तक अपना नामांकन पत्र दाखिल कर सकेंगे. वहीं, 24 अप्रैल को नामांकन पत्रों की जांच होगी. साथ ही 26 अप्रैल तक प्रत्याशी नाम वापस ले सकेंगे.

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