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दशहरा का पूरा दिन शुभ मुहूर्त, नए काम की शुरूआत के लिए फलदायी

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दस दिशाओं पर राज करने वाला परम ज्ञानी पंडित, सर्वशक्तिमान और शिवभक्त लंकापति रावण के वध के उपलक्ष्य में विजयदशमी का त्योहार मनाया जाता है. 19 अक्टूबर को पूरे देश में विजयदशमी यानी कि दशहरे का त्योहार मनाया जा रहा है. हम आपकों बताते हैं कि दशहरे का दिन एक शुभ मुहूर्त क्यों होता है.

दशहरा यानी कि एक ऐसा मुहूर्त वाला दिन जिस दिन बिना मुहूर्त देखे आप किसी भी नए काम की शुरुआत कर सकते हैं. आश्विन शुक्ल यानी कि दशमी को मनाए जाने वाला यह त्योहार ‘विजयादशमी’ या ‘दशहरा’ के नाम से प्रचलित है. यह त्योहार वर्षा ऋतु की समाप्ति का सूचक है. इन दिनों चौमासे में स्थगित कार्य फिर से शुरू किए जा सकते हैं.

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अहंकार का विनाश
नवरात्रि के 9 दिनों तक मां दुर्गा की आराधना करने के बाद भगवान श्रीराम ने दशमी के दिन ही लंकापति रावण का वध किया था, तभी से दशहरा पर्व मनाया जाता है. श्रीराम ने रावण के अहंकार को चूर-चूर करके दुनिया के लिए भी एक बहुत मूल्यवान शिक्षा प्रदान की. जिसकी हम सभी को रोजमर्रा के जीवन में बहुत जरूरत है.

श्रीराम की पूजा
विजयदशमी के दिन भगवान श्रीराम की पूजा का दिन भी है. इस दिन घर के दरवाजों को फूलों की मालाओं से सजाया जाता है. घर में रखे शस्त्र, वाहन आदि भी पूजा की जाती है. दशहरे का यह त्योहार बहुत ही पावनता के साथ संपन्न करते हुए रावण का दहन किया जाता है.

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लोहड़ी का पर्व आज, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त और इसका महत्‍व

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मकर संक्रांति के एक दिन पहले पड़ने वाला त्योहार ‘लोहड़ी’ पंजाबियों का मुख्य त्योहार है, जिसे पंजाबी और सिख मिलकर बड़ी ही धूमधाम से मनाते हैं. मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर मनाए जाने वाले लोहड़ी का नाम सुनते ही मन में बीच में जलते अलाव और उसके चारों ओर भांगड़ा, गिद्दा करते सिख और मूंगफली और रेवड़ी की तस्वीर उभरने लगती है. वैसे तो लोहड़ी को लेकर कई तरह की कथाऐं और मान्यताऐं जुड़ी है. पर क्या आपको पता है कि सिखों में एक लोहड़ी ब्याहने की परंपरा भी होती है. जिसमें लोहड़ी से पहले लोहड़ी की तैयारी करने के लिए लोकगीत गाकर लोग लकड़ी और उपले इकट्ठे करते हैं, जिसे ये एक चौराहे या पिंड के बीचों-बीच इकट्ठा करते हैं, जिसे रात में जलाना होता है. इस अवसर पर विवाहिता पुत्रियों को मां के घर से सिंधारा (वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी और फल भेजे जाते हैं, जिसे लोहड़ी ब्याहना कहते हैं.

बता दें रात के समय जब लोहड़ी जलाई जाती है तब सिख समुदाय की सभी महिलाएं और पुरुष कामकाज से निपटकर अग्नि की परिक्रमा करता है और तिल, रेवड़ी और मक्के की आहुती देता है, जिसे फुल्ली कहते हैं. वहीं लोहड़ी में फुल्ली भेंट करने के बाद इन्हीं सब चीजों का प्रसाद भी बांटा जाता है, जिसे सभी लोग खाते हैं और एक-दूसरे को लोहड़ी की शुभकामनाएं देते हैं. बता दें घर लौटते समय लोहड़ी में से दो चार दहकते कोयले, प्रसाद के रूप में, घर पर लाने की प्रथा भी है.

लोहड़ी शुभ मुहूर्त: लोहड़ी पूजा का शुभ मुहूर्त 13 जनवरी को शाम 5 बजकर 41 मिनट से शुरू होकर 7 बजकर 4 मिनट तक रहेगा.

लोहड़ी महत्व: सर्दियों की मुख्य फसल गेहूं है, जो अक्टूबर मे बोई जाती है जबकि, मार्च के अन्त में और अप्रैल की शुरुआत में काटी जाती है. फसल काटने और इकट्ठा करके घर लाने से पहले, किसान इस लोहड़ी त्योहार का आनंद मनाते हैं. लोहड़ी को मनाते समय किसान सूर्य देवता को धन्यवाद देते हैं और आग में फुल्ले डालते हुए कहते हैं ‘आधार आए दिलाथेर जाए’ जिसका मतलब होता है कि घर में सम्मान आए और गरीबी भाग जाए. सुबह बच्चे घर-घर जाकर लोहड़ी मांगते हैं. जिसमें लोग उन्हें पैसा और खाने-पीने की चीजें देते हैं. ऐसा माना जाता है कि किसान खेत में आग जलाकर अग्नि देवता से अपनी जमीन को आशीर्वाद देकर उसकी उत्पादन क्षमता बढ़ाने की प्रार्थना करते हैं. पूजा के बाद सभी को प्रसाद दिया जाता है. बता दें पंजाब में लोहड़ी को नए साल की शुरुआत भी मानते हैं.

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कौन था दुल्ला भट्टी ?
अमूमन लोहड़ी में लोग गीत गाते हुए दुल्ला भट्टी की कहानी सुनाते हुए नाच गाना करते हैं. लोहड़ी पर दुल्ला भट्टी की कहानी सुनने का खास महत्व होता है. दरअसल, मुगल काल में अकबर के दौरान दुल्ला भट्टी पंजाब में ही रहता है. कहते हैं कि दुल्ला भट्टी ने पंजाब की लड़कियों की उस वक्त रक्षा की थी जब संदल बार में लड़कियों को अमीर सौदागरों को बेचा जा रहा था. वहीं एक दिन दुल्ला भट्टी ने इन्हीं अमीर सौदागरों से लड़कियों को छुड़वा कर उनकी शादी हिन्दू लड़कों से करवाई थी. और तभी से इसी तरह दुल्ला भट्टी को नायक की उपाधि से सम्मानित किया जाने लगा और हर साल हर लोहड़ी पर ये कहानी सुनाई जाने लगी.

कहां से आया लोहड़ी शब्द?
मान्यता है कि लोहड़ी शब्द ‘लोई’ यानी (संत कबीर की पत्नी) से उत्पन्न हुआ था, लेकिन कई लोग इसे तिलोड़ी से उत्पन्न हुआ भी मानते हैं, जो बाद में लोहड़ी शब्द हो गया. वहीं कुछ लोगों का ये भी मानना है कि यह शब्द ‘लोह’ यानी चपाती बनाने के लिए प्रयुक्त एक उपकरण से निकला है.

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मकर संक्रांति : 14 को नहीं 15 को मनेगी, जानें क्यों और किन चीजों का करें दान

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भगवान सूर्य जब धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं तब मकर संक्रांति मनाई जाती है. अधिकतर ज्योतिषियों के अनुसार मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जाएगी. काशी वेद वेदांग विद्यापीठ, वाराणसी के आचार्य व्यकटेश शर्मा ने बताया कि इस बार 14 जनवरी को रात्रि 2.10 बजे सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेगा. 15 जनवरी को उदय तिथि पड़ने के कारण संक्रांति 15 को ही मनाई जायेगी. पुण्य काल 15 जनवरी को प्रात: से सूर्यास्त तक रहेगा. सनातन धर्म में मकर संक्रांति की काफी महत्ता है. इसके साथ ही सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण हो जाएंगे और खरमास समाप्त हो जाएगा. कहा गया है कि सूर्यास्त से पहले सूर्य का संक्रमण हो तो उसी तिथि व दिन मकर संक्रांति मनाना शास्त्रसम्मत है.

बनारसी पंचांगों के अनुसार 14 जनवरी की रात मध्य रात्रि के बाद सूर्य का संक्रमण होने से मंगलवार को ही मकर संक्रांति मनाना शास्त्र सम्मत है. उनके अनुसार इसके पूर्व में भी 12 और 13 जनवरी को मकर संक्रांति मनायी जाती रही है. स्वामी विवेकानंद के जन्म पर 12 जनवरी को मकर संक्रांति मनी थी. आने वाले 70 वर्षों में 16-17 जनवरी को भी मकर संक्रांति होगी. उन्होंने बताया कि लोगों को इस दिन तिल, कंबल, घी, मिष्ठान आदि का दान करना चाहिए.

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इस दिन दान और स्नान का विशेष महत्व है. लोग इस दिन पवित्र नदियों और जलाशयों में स्नान कर पुण्य प्राप्त करते हैं. ऐसा माना जाता है कि सूर्य की आराधना का विशेष पर्व मकर संक्रांति मनाने से पापों का शमन होता है. मकर संक्रान्ति में लकड़ी, तिल, अन्न, उड़द की दाल, चावल, पापड़, घी, गुड़, नमक, कम्बल, ऊनी वस्त्र का दान करना बहुत ही उत्तम माना जाता है. अगर आप पवित्र नदियों में स्नान करने नहीं जा सकते तो घर पर ही स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देकर दान कर सकते हैं. संक्रांति के दिन गरीब लोगों को गुड़ और गर्म कपड़ों का दान करना चाहिए.

क्या है इस दिन की मान्यता
मान्यता है कि ऐसा करने से पितर प्रसन्न होते हैं. मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा उनसे मिली थीं. इसके अलावा भीष्म पितामह ने भी अपना देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति के पावन दिन का ही चयन किया था.

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नव वर्ष : उल्लास, आत्मावलोकन और नव सृजन के संकल्प का दिन: विष्णु प्रभाकर

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आज से नव वर्ष शुरू हो रहा है. यह उल्लास का दिन है, आत्मावलोकन का दिन है और नव सृजन के संकल्प का दिन है. आज का दिन पिछले साल की गलतियों से सबक लेने का है और नए साल के लिए नया लक्ष्य निर्धारित करने का है. यह लक्ष्य परिवर्तन का होना चाहिए, नए निर्माण का होना चाहिए और सकारात्मक सुधार का होना चाहिए. लक्ष्य खुद के लिए भी होना चाहिए और परिवार, समाज व राष्ट्र के लिए भी होना चाहिए. हम सभी को मिलकर नए भारत के निर्माण का लक्ष्य बनाना चाहिए. सामाजिक बुराइयों, मानवीय विषमताओं और हर स्तर पर व्याप्त असमानताओं को खत्म करने की दिशा में हमें सामूहिक संकल्प लेना चाहिए. हम सभी को अपने जीवन से नाकारात्मकताओं को समाप्त करने का प्रण भी लेना चाहिए.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी 51वीं मन की बात में उम्मीद जताई है कि नए साल में भारत उपलब्धियों की नई बुलंदी को छुएगा. प्रधानमंत्री के तौर पर राष्ट्र को आगे ले जाने का संकल्प सराहनीय है. लेकिन यह संकल्प तभी साकार होगा, जब समूचा देश कदम मिलाकर आगे बढ़ेगा. भारत विशाल देश है, इस नाते आकांक्षाएं भी विशाल हैं. इसलिए इसे पूरा करने के लिए हमारा लक्ष्य भी विशाल होना चाहिए. गुजरे साल में हमने कई उपलब्धियां हासिल की हैं. स्वच्छता की दिशा में हम आगे बढ़े हैं. उपग्रह छोड़ने के मामले में हमने कीर्तिमान रचा है. चिकित्सा के क्षेत्र में रोबोटिक सर्जरी समेत कई तकनीकी क्षमताएं प्राप्त की हैं.

आयुष्मान योजना का लागू होना स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में क्रांति लाने जैसा है. प्राथमिक व उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कई सुधार हुए. बस्ते का बोझ कम हुआ. पर्यावरण के क्षेत्र में पीएम मोदी को यूएन का सम्मान मिला. बेटियों ने नाव से विश्व की परिक्रमा की, परमाणु पनडुब्बी की पहली गश्त पूरी हुई. हाईस्पीड ट्रेन-18 का सफल ट्रायल हुआ, ब्रहमपुत्र पर सबसे लंबे रेल-रोड पुल व सबसे लंबे सड़क पुल राष्ट्र को समर्पित किया गया. एशियन गेम्स में 2018 में भारत ने सर्वाधिक पदक जीते, क्रिकेट में भारत ने जीत के कई कीर्तिमान रचे. कश्मीर में आतंकवाद की कमर तोड़ी, चीन से संबंध सुधरे. अमेरिका, रूस, जापान व ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत ने संतुलन कायम रखा, ईरान के साथ रिश्ते बेहतर रहे. शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र रहा, जिसमें भारत ने कोई न कोई उपलब्धि हासिल न की हो. इसी मोमेंटम को इस नव वर्ष में बनाए रखना है.

हमें विज्ञान, शिक्षा, चिकित्सा, अर्थव्यवस्था, रक्षा-सुरक्षा, राजनीति, विनिर्माण आदि हर क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों को विस्तार देना चाहिए. हमें अनुत्पादक चीजों से मुक्ति पानी चाहिए और सतत विकास पर अपनी ऊर्जा को केंद्रित करना चाहिए. 2018 में भीड़ हिंसा और नफरत की कुछ घटनाओं ने देश के सदभाव के दामन पर दाग लगाए. नर्व वर्ष में इन बुराइयों को खत्म करने की दिशा में कदम उठाया जाना चाहिए. पिछले साल हम रोजगार सृजन के मोर्चे पर उम्मीद के अनुरूप नहीं कर पाए, इस साल हमें इस मुद्दे पर बेहतर करना चाहिए. नए साल में अर्थव्यवस्था को मजबूत करना चाहिए, नए आर्थिक सुधार को आगे बढ़ाना चाहिए, बैंकिंग व वित्तीय क्षेत्र को स्थिर व मजबूत करना चाहिए. सीबीआई समेत सभी सरकारी स्वायत्त निकायों को और बेहतर बनाया जाना चाहिए.

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पुलिस, प्रशासनिक व न्यायिक सुधार के लिए कदम उठाया जाना चाहिए. दिनोंदिन गिर रही राजनीति में सुधार लाना चाहिए. राजनीति से विभाजनकारी तत्वों को खत्म करने की जरूरत है. नया साल चुनाव आयोग के लिए चुनौतीपूर्ण रहने वाला है. देश में आम चुनाव व सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे. इस साल भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंटरनेट ऑफ थाउट और रोबोटिक साइंस में बहुत कुछ नया करेगा. हम सभी का यत्न होना चाहिए कि 2019 बदलावों का गवाह बने, देश नई ऊंचाई को छुए, हालांकि इसके लिए सरकार को अपने विकास के एजेंडे पर केंद्रित रहना होगा. नव वर्ष सबके लिए नई उपलब्धि व खुशी लेकर आए.

 

लेखक: क्षेत्र प्रमुख, भारत संस्कृत परिषद्

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