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नवरात्रि 2018: मुंगेर की मां चंडिका के दरबार के काजल लगाने से ठीक होते हैं आंखों के रोग

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बिहार के मुंगेर जिला मुख्यालय के समीप स्थित मां चंडिका स्थान शक्तिपीठ की पूजा करने से नेत्रपीड़ा से छुटकारा मिलता है. मान्यता है कि यहां पार्वती (सती) की बाईं आंख गिरी थी. इस मंदिर को द्वापर युग की कहानियों से भी जोड़ा जाता है. बिहार के मुंगेर जिला मुख्यालय से करीब दो किलोमीटर दूर इस शक्तिपीठ में मां की बाईं आंख की पूजा की जाती है. कहा जाता है कि 52 शक्तिपीठों में से एक मां चंडिका स्थान में पूजा करने वालों की आंखों की पीड़ा दूर होती है.

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चंडिका स्थान के मुख्य पुजारी नंदन बाबा ने बताया कि यहां आंखों के असाध्य रोग से पीड़ित लोग पूजा करने आते हैं और यहां से काजल लेकर जाते हैं. ऐसी मान्यता है कि यहां का काजल नेत्ररोगियों के विकार दूर करता है. इस स्थान पर ऐसे तो सालभर देश के विभिन्न क्षेत्रों आए मां के भक्तों की भीड़ लगी रहती है, लेकिन शारदीय और चैत्र नवरात्र में यहां भक्तों की भीड काफी बढ़ जाती है.

नंदन बाबा ने बताया कि चंडिका स्थान एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है. नवरात्र के दौरान सुबह तीन बजे से ही माता की पूजा शुरू हो जाती है. संध्या में शृंगार पूजन होता है. नवरात्र अष्टमी के दिन यहां विशेष पूजा होती है. इस दिन माता का भव्य शृंगार किया जाता है. यहां आने वाले लोगों की सभी मनोकामना मां पूर्ण करती हैं.मंदिर के एक अन्य पुजारी कहते हैं कि इस मंदिर के विषय में कोई प्रामाणिक इतिहास उपलब्ध नहीं है, लेकिन इससे जुड़ी कई कहानियां काफी प्रसिद्ध हैं.

मान्यता है कि राजा दक्ष की पुत्री सती के जलते हुए शरीर को लेकर जब भगवान शिव भ्रमण कर रहे थे, तब सती की बाईं आंख यहां गिरी थी. इस कारण यह 52 शक्तिपीठों में एक माना जाता है. वहीं दूसरी ओर इस मंदिर को महाभारत काल से भी जोड़ कर देखा जाता है. जनश्रुतियों के मुताबिक, अंगराज कर्ण मां चंडिका के भक्त थे और रोजाना मां चंडिका के सामने खौलते हुए तेल की कड़ाह में अपनी जान दे मां की पूजा किया करते थे, जिससे मां प्रसन्न होकर राजा कर्ण को जीवित कर देती थी और सवा मन सोना रोजाना कर्ण को देती थीं. कर्ण उस सोने को मुंगेर के कर्ण चौराहा पर ले जाकर लोगों को बांट देते थे.

इस बात की जानकारी जब उज्जैन के राजा विक्रमादित्य को मिली तो वे भी छद्म वेश बनाकर अंग पहुंच गए. उन्होंने देखा कि महाराजा कर्ण ब्रह्म मुहूर्त में गंगा स्नान कर चंडिका स्थान स्थित खौलते तेल के कड़ाह में कूद जाते हैं और बाद माता उनके अस्थि-पंजर पर अमृत छिड़क उन्हें पुन: जीवित कर देती हैं और उन्हें पुरस्कार स्वरूप सवा मन सोना देती हैं.

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एक दिन चुपके से राजा कर्ण से पहले राजा विक्रमादित्य वहां पहुंच गए. कड़ाह में कूदने के बाद उन्हें माता ने जीवित कर दिया. उन्होंने लगातार तीन बार कड़ाह में कूदकर अपना शरीर समाप्त किया और माता ने उन्हें जीवित कर दिया. चौथी बार माता ने उन्हें रोका और वर मांगने को कहा. इस पर राजा विक्रमादित्य ने माता से सोना देने वाला थैला और अमृत कलश मांग लिया.

आज भी इस मंदिर में पूजा के पहले लोग विक्रमादित्य का नाम लेते हैं और फिर चंडिका मां का. यहां पूजा करने वाले मां की पूजा में बोल जाने वाले मंत्र में पहले ‘श्री विक्रम चंडिकाय नम:’ का उच्चारण किया जाता है. यह मंदिर पवित्र गंगा के किनारे स्थित है और इसके पूर्व और पश्चिम में श्मशान स्थल है.

इस कारण ‘चंडिका स्थान’ को ‘श्मशान चंडी’ के रूप में भी जाना जाता है. नवरात्र के दौरान कई विभिन्न जगहों से साधक तंत्र सिद्घि के लिए भी यहां जमा होते हैं. चंडिका स्थान में नवरात्र के अष्टमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है. इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. मां के विशाल मंदिर परिसर में काल भैरव, शिव परिवार और भी कई देवी-देवताओं के मंदिर हैं जहां श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं.

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धनतेरस आज, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि, इस दिन राशि के अनुसार क्या खरीदें

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कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धन की देवी के उत्सव का प्रारंभ होने के कारण इस दिन को धनतेरस के नाम से जाना जाता है. धनतेरस को धन त्रयोदशी व धन्वन्तरी त्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है. धनतेरस पर पांच देवताओं, गणेश जी, मां लक्ष्मी, ब्रह्मा,विष्णु और महेश की पूजा होती है. कहा जाता है कि इसी दिन भगवान धनवन्‍तरी का जन्‍म हुआ था जो कि समुन्‍द्र मंथन के दौरान अपने साथ अमृत का कलश और आयुर्वेद लेकर प्रकट हुए थे और इसी कारण से भगवान धनवन्‍तरी को औषधी का जनक भी कहा जाता है.

धनतेरस पर खरीदारी का शुभ मुहूर्त
सुबह 07:07 से 09:15 बजे तक
दोपहर 01:00 से 02:30 बजे तक
रात 05:35 से 07:30 बजे तक

कैसे करें धनतेरस की पूजा
1. सबसे पहले मिट्टी का हाथी और धन्वंतरि भगवानजी की फोटो स्थापित करें.
2. चांदी या तांबे की आचमनी से जल का आचमन करें.
3. भगवान गणेश का ध्यान और पूजन करें.
4. हाथ में अक्षत-पुष्प लेकर भगवान धन्वंतरि का ध्यान करें.

पूजा के समय इस मंत्र का करें जप

देवान कृशान सुरसंघनि पीडितांगान, दृष्ट्वा दयालुर मृतं विपरीतु कामः
पायोधि मंथन विधौ प्रकटौ भवधो, धन्वन्तरि: स भगवानवतात सदा नः
ॐ धन्वन्तरि देवाय नमः ध्यानार्थे अक्षत पुष्पाणि समर्पयामि

राशि अनुसार करें खरीदारी
मेष राशि – चांदी के बर्तन एवं इलेक्ट्रानिक सामान खरीदना लाभदायक रहेगा.
वृष राशि – चमकीले वस्त्र चांदी अथवा ताबें के बर्तन खरीदना शुभ रहेगा.
मिथुन राशि – सोने के आभूषण, केसर, वाहन, खरीदना शुभ रहेगा.
कर्क राशि – चांदी के आभूषण, सिक्के एवं घरेलू इलैक्ट्रिक सामान खरीदना उत्तम रहेगा.
सिंह राशि – ताबें, कांसे के बर्तन,कपड़े एवं सोने की कोई चीज खरीदना शुभ रहेगा.
कन्या राशि – गणेश जी की मरगज की मूर्ति, चांदी का सामान अथवा रसोई का सामान खरीदना शुभ रहेगा.
तुला राशि – सौन्दर्य का सामान, चांदी के बर्तन, सिक्के या सोने का सामान, अथवा सजावटी सामान खरीदना शुभ फलदायक रहेगा.
वृश्चिक राशि – इलैक्ट्राॅनिक उपकरण सोने के आभूषण खरीदना शुभ रहेगा.
धनु राशि – सुगंधित सामान, सोने के सिक्के, आभूषण अथवा सोने का सामान खरीदना शुभ रहेगा.
मकर राशि – वाहन, कपड़े, चांदी के बर्तन, आभूषण खरीदना शुभ रहेगा.
कुंभ राशि – प्रसाधन के सामान, दो पहिया वाहन, सौन्दर्य प्रसाधन का सामान खरीदना शुभ होगा.
मीन राशि – चांदी के सिक्के, सोना, चांदी के बर्तन एवं इलैक्ट्रानिक उपकरण खरीदना लाभदायक रहेगा.

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कानपुर के अलावा जानें और कहा है रावण का मंदिर जहां की जाती है पूजा

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बुराई पर अच्छाई की जीत का त्योहार दशहरा 19 अक्टूबर, शुक्रवार को मनाया जा रहा है. इस दिन भगवान राम बुराई का प्रतीक रावण का दहन करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश के कई हिस्सों में रावण की पूजा की जाती है. इन जगहों पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है. कानपुर से लेकर जोधपुर तक रावण से जुड़े कई किस्से प्रचलित हैं.

कानपुर: कानपुर के शिवालय एरिया में रावण मंदिर है जो सिर्फ दशहरे वाले दिन ही खुलता है. यहां कुछ लोग रावण की पूजा करते हैं. कानपुर के शिवाला इलाके के दशानन मंदिर में शक्ति के प्रतीक के रूप में रावण की पूजा होती है तथा श्रद्धालु तेल के दिए जलाकर रावण से अपनी मन्नतें पूरी करने की प्रार्थना करते हैं. कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 1890 किया गया था. रावण के इस मंदिर के साल के केवल एक बार दशहरे के दिन ही खोले जाते हैं. परंपरा के अनुसार, दशहरे पर सुबह मंदिर के दरवाजे खोले जाते हैं. फिर रावण की प्रतिमा का साज श्रृंगार कर, आरती की जाती है. दशहरे पर रावण के दर्शन के लिए इस मंदिर में भक्तों की भीड़ लगी रहती है और शाम को मंदिर के दरवाजे एक साल के लिए बंद कर दिए जाते हैं.

जोधपुर में रावण की ससुराल: जोधपुर के माउदगिल ब्रह्माण रावण के ही वंशज माने जाते हैं. उन्‍होंने जोधपुर में रावण के मंदिर का निर्माण करवाया है. कहा ये भी जाता है कि रावण की पत्‍नी मंदोदरी यहां की थीं. यहां पर रहने वाले करीब 200 परिवार खुद को रावण का वशंज बताते हैं और रावण की पूजा करते हैं.

मंदसौर में रावण की पूजा: मंदसौर का प्राचीन नाम “दशपुर” था और यह स्थान रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका था. इसके मद्देनजर हिन्दुओं के नामदेव समुदाय के लोग रावण को”मंदसौर का दामाद” मानते हैं. जोधपुर में रावण और मन्दोदरी के विवाह स्थल पर आज भी रावण की चवरी नामक एक छतरी मौजूद है. शहर के चांदपोल क्षेत्र में रावण का मंदिर बनाया गया है.राज्य के विदिशा जिले के रावण रूण्डी गांव में भी दशानन का मंदिर है, जहां लेटी हुई अवस्था में इस पौराणिक पात्र की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है. स्थानीय लोग दशानन को “रावण बाबा” के रूप में पूजते हैं.

बिसरख रावण का ननिहाल: उत्तर प्रदेश के नोएडा गौतमबुद्ध नगर जिले के बिसरख गांव में भी रावण का मंदिर है. मान्यता है कि बिसरख रावण का ननिहाल था.यहां पर रावण दहन नहीं किया जाता है.

उज्जैन के चिखली में रावण पूजन: मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के चिखली गांव में भी रावण का दहन नहीं किया जाता. यहां के बारे में कहा जाता है कि रावण की पूजा नहीं करने पर गांव जलकर राख हो जाएगा.

रावण की पूरे शहर में आरती होती है: इटावा जिले की जसवंतनगर में दशहरे वाले दिन रावण की पूरे शहर में आरती उतार कर पूजा की जाती है. उसे जलाने की बजाय रावण को मार-मारकर उसके टुकड़े कर दिए जाते हैं. लोग रावण के उन टुकड़ों को उठाकर घर ले जाते हैं. रावण की मौत के तेरहवें दिन रावण की तेरहवीं की जाती है.

कर्नाटक: कोलार जिले में लोग फसल महोत्सव के दौरान रावण की पूजा करते हैं और इस मौके पर जुलूस भी निकाला जाता है. ये लोग रावण की पूजा इसलिए करते हैं क्योंकि वह भगवान शिव का परम भक्त था. लंकेश्वर महोत्सव में भगवान शिव के साथ रावण की प्रतिमा भी जुलूस में निकाली जाती है. इसी राज्य के मंडया जिले के मालवल्ली तहसील में रावण का एक मंदिर भी है.

हिमाचल प्रदेश: हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में शिवनगरी के नाम से मशहूर बैजनाथ कस्बा है. यहां के लोग रावण का पुतला जलाना महापाप मानते है. यहां पर रावण की पूरी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना की जाती है. मान्यता है कि यहां रावण ने कुछ साल बैजनाथ में भगवान शिव की तपस्या कर मोक्ष का वरदान प्राप्त किया था.

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दशहरा का पूरा दिन शुभ मुहूर्त, नए काम की शुरूआत के लिए फलदायी

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दस दिशाओं पर राज करने वाला परम ज्ञानी पंडित, सर्वशक्तिमान और शिवभक्त लंकापति रावण के वध के उपलक्ष्य में विजयदशमी का त्योहार मनाया जाता है. 19 अक्टूबर को पूरे देश में विजयदशमी यानी कि दशहरे का त्योहार मनाया जा रहा है. हम आपकों बताते हैं कि दशहरे का दिन एक शुभ मुहूर्त क्यों होता है.

दशहरा यानी कि एक ऐसा मुहूर्त वाला दिन जिस दिन बिना मुहूर्त देखे आप किसी भी नए काम की शुरुआत कर सकते हैं. आश्विन शुक्ल यानी कि दशमी को मनाए जाने वाला यह त्योहार ‘विजयादशमी’ या ‘दशहरा’ के नाम से प्रचलित है. यह त्योहार वर्षा ऋतु की समाप्ति का सूचक है. इन दिनों चौमासे में स्थगित कार्य फिर से शुरू किए जा सकते हैं.

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अहंकार का विनाश
नवरात्रि के 9 दिनों तक मां दुर्गा की आराधना करने के बाद भगवान श्रीराम ने दशमी के दिन ही लंकापति रावण का वध किया था, तभी से दशहरा पर्व मनाया जाता है. श्रीराम ने रावण के अहंकार को चूर-चूर करके दुनिया के लिए भी एक बहुत मूल्यवान शिक्षा प्रदान की. जिसकी हम सभी को रोजमर्रा के जीवन में बहुत जरूरत है.

श्रीराम की पूजा
विजयदशमी के दिन भगवान श्रीराम की पूजा का दिन भी है. इस दिन घर के दरवाजों को फूलों की मालाओं से सजाया जाता है. घर में रखे शस्त्र, वाहन आदि भी पूजा की जाती है. दशहरे का यह त्योहार बहुत ही पावनता के साथ संपन्न करते हुए रावण का दहन किया जाता है.

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