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मिसाल: ‘नाच बाजा डॉट कॉम’ स्टार्टअप के जरिये यह ट्रांसजेंडर अपने कम्युनिटी के लोगों को दे रही हैं रोजगार के मौके

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समाज में ट्रांसजेंडर समुदाय से जुड़े लोगों को कितनी उपेक्षा झेलनी पड़ती है, कहने की जरूरत नहीं. यह उपेक्षा ही वह वजह है कि समाज में लोगों के साथ उनका सरोकार बहुत सीमित ही देखने को मिलता है. वहीं एक ऐसी ट्रांसजेंडर हैं जो अपने कम्युनिटी के लोगों को रोजगार उपलब्ध करा रही है. उसका नाम है रेशमा प्रसाद. रेशमा पटना में रहती हैं और ट्रांसजेंडर वुमेन हैं और अपने समुदाय के सरोकारों के प्रति बेहद प्रतिबद्ध. इन दिनों नई दिल्ली के प्रगति मैदान में स्टार्टअप एक्सपो का आयोजन चल रहा है. पटना, बिहार से ट्रांसजेंडर वुमेन रेशमा प्रसाद भी यहां पहुंची हैं.

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ट्रांसजेंडर वुमेन रेशमा की पहचान है और वह अपनी पहचान को छिपाती नहीं. उनका स्टार्टअप एक्सपो में आने वाले तमाम आगंतुकों सहित देश विदेश से आने वाले लोगों को हैरत में डाल रहा है. स्टाल पर थर्ड जेंडर की सक्रियता जहां पहली नजर में लोगों का ध्यान आकृष्ट कर रहा है वहीं उनकी जो स्टार्टअप है उसका थीम भी लोगों को लुभा रहा है. रेशमा और उनकी कुछ ट्रांसजेंडर फ्रेंड्स अपने स्टार्टअप ‘नाच बाजा डॉट कॉम’ लेकर यहां पहुंचे हैं.

रेशमा कहती हैं, ”नाच बाजा डॉट कॉम’ देश का पहला ट्रांसजेंडर स्टार्टअप है. आप जानते हैं कि ट्रांसजेंडर कम्युनिटी को लेकर समाज में कई मिसकन्सेप्शन हैं. लोग हमें उपेक्षा के भाव से देखते हैं. जबकि हम भी आम इन्सान हैं. हमारी भी संवेदनाएं हैं. हम भी समाज के बीच के ही लोग हैं. हम ऐसे बिल्कुल नहीं हैं जिन्हें हेय या तुच्छ समझा जाए. लेकिन दुर्भाग्य से समाज का नजरिया अभी भी बहुत कुछ भेदभाव वाला है. ऐसे में हम यह स्टार्टअप लेकर आए हैं. उम्मीद करते हैं यह स्टार्टअप ट्रांसजेंडर समुदाय को सम्मानजनक जीवन देने में सहायक साबित होगा.’

जैसा कि आप जानते हैं ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग कला जगत से जुड़े होते हैं. नाचगाना उनकी आजीविका का प्रमुख साधन है. यह स्टार्टअप ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों कला का एक मंच उपलब्ध कराने का अनूठा बिजनेस मॉडल है. रेशमा ने बताया कि ‘नाच बाजा डॉट कॉम’ अभी आॅफलाइन ही है. काम चल रहा है. इसके इस साल दिसम्बर तक आॅनलाइन करने की कोशिश की जा रही है. पूरे देश के तकरीबन डेढ़ हजार ट्रांसजेंडर्स इससे जुड़ चुके हैं. उन्हें इसके जरिए काम दिलाने की दिशा में कार्य जारी है.

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आखिर उन्हें कैसे और क्या काम मिलेगा? रेशमा कहती हैं, ‘ ट्रांसजेंडर्स अपनी आजीविका के लिए डांस—म्यूजिक जैसे आर्ट फॉर्म से जुड़े ​होते हैं. उन्हें कहीं काम मिलता है तो उन्हें उतना पैसा नहीं मिल पाता है जितना मिलना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि ज्यादातर पैसा काम दिलाने वाले दलाल की जेब में चला जाता है. हमारे स्टार्टअप के जरिए यह व्यवस्था सुधर जाएगी. ट्रांसजेंडर कलाकारों को उनका वाजिब मेहनताना मिल पाएगा. कहीं से कोई दलाली नहीं जाएगी. वह पैसा भी आर्टिस्ट के ही हिस्से जाएगा. इससे उनका शोषण नहीं हो पाएगा और उन्हें खुशहाली भी मिल पाएगी.

रेशमा बताती है कि अब तक तकरीबन दो सौ ट्रांसजेंडर्स को काम दिलाया जा चुका है. सका है. आखिर कोई ट्रांसजेंडर्स कैसे इस व्यवस्था से लाभान्वित हो सकते हैं? रेशमा कहती हैं,’ कोई संस्था, आयोजक या व्यक्ति उनके वेबसाइट के जरिए उनसे संपर्क कर सकता है. काम करने को इच्छुक ट्रांसजेंडर्स भी हमसे संपर्क कर सकते हैं. हम उसे अपने वेबसाइट पर रजिस्टर्ड कर लेते हैं. और इस प्रक्रिया के लिए उनसे बस नाममात्र 100 रुपये एक सौ रुपये की फीस ली जाती है. वाकई एक वंचित समुदाय के व्यक्ति के द्वारा अपने समुदाय की उन्नति के लिए उठाए गए इस कदम की जितनी प्रशंसा की जाए कम ​है.

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विलुप्त होती प्राचीन कला भित्ति-चित्र को फिर से स्थापित कर रही है बिहार की बेटी प्रीति

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देश की सबसे प्राचीन कला में शुमार भित्ति चित्र भले ही अब कुछ राज्यों की पहचान हो, लेकिन शहर की एक कलाकार इसे देश भर में फिर से स्थापित करने में लगी हैं. पंद्रह वर्षों के अथक प्रयास से इन्होंने इस कला को वैसे शहरों में स्थापित किया है, जहां से यह विलुप्त हो गयी थी. गोबर, मिट्टी व प्राकृतिक रंगों से दीवारों पर भित्ति चित्र बनाने के साथ प्रीति इस कला को बचाये रखने के लिये लोगों को जागरूक भी कर रही हैं. आधुनिक परिवेश में रह रहे लोगों को घर की दीवारों पर गोबर से चित्रकारी के लिये राजी करना आसान नहीं होता, लेकिन प्रीति की कलाकृति ही ऐसी होती है, कि लोग मोहित हो जाते हैं. अपनी कला साधना की बदौलत प्रीति ने दिल्ली के कई घरों व मॉल में चित्र बनाया है.

दादी से हुईं प्रभावित
प्रीति बताती हैं कि उनका पुश्तैनी मकान मुजफ्फरपुर, गायघाट के बाघाखाल में है. बचपन में वह दादी को घर की दीवारों पर गोबर व मिट्टी से कलाकृति बनाते देखती थीं. यह कला उनके मन में बैठ गयी. फिर वे खुद गोबर व मिट्टी लेकर दीवारों पर चित्र बनाने लगीं. राजनीति शास्त्र में एमए करने के बाद वे दिल्ली चली आयीं, लेकिन भित्ति-चित्र बनाना नहीं छोड़ा. यहां लोग इस कला से काफी प्रभावित हुए. कई लोगों ने घर की दीवारों पर बनवाया. केंद्र सरकार का पर्यटन मंत्रालय ने भी प्रीति के भित्ति-चित्र व स्क्रैप पेंटिंग से प्रभावित होकर कलाकारों की सूची में शामिल किया है. अब ये स्मार्ट सिटी सहित पर्यटन वाले क्षेत्रों में भित्ति-चित्र व स्क्रैप पेंटिंग बना रही हैं.

कई शहरों में बनाये भित्ति-चित्र व मेराल
प्रीति कहती हैं कि सबसे पहले उन्होंने भोपाल में भित्ति चित्र व मेराल बनाये. इसके बाद मसूरी, देहरादून, चंडीगढ़, दिल्ली, इंदौर, गंगटोक व उत्तरकाशी के कई जगहों पर भित्ति-चित्र व मेराल बना कर लोगों को प्राचीन कला के संरक्षण का संदेश दिया है. मुजफ्फरपुर के एक छोटे से गांव से सीखी कला को आज पूरे देश में लोग पसंद कर रहे हैं, यह मेरे लिये बड़ी बात है. प्रीति कहती हैं कि नयी पीढ़ी गोबर व मिट्टी की उपेक्षा नहीं करें. जिन घरों में गोबर का उपयोग होता है, वहां बैक्टीरिया नहीं पनपते. लोगों को इस कला को बचाये रखने के लिये आगे आना चाहिए.

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लाखों की नौकरी छोड़ मुजफ्फरपुर के इस युवक ने मक्के के छिलके से बना डाला बैग

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एमटेक के बाद लाखों रुपए की नौकरी छोड़ बिहार के मुजफ्फरपुर के मोहम्मद नाज अपने गांव आ गए क्योंकि वो अपने सपनों को पूरा करना चाहते थे. शुरुआत में गांव वालों ने उनका मजाक उड़ाया लेकिन अब उन्हें अपने बेटे पर गर्व है. बिहार के मुजफ्फरपुर के मोहम्मद नाज ने प्लास्टिक से पर्यावरण को मुक्त करने का संकल्प लिया था. लंबे समय से रिसर्च के बाद अब उन्होंने मक्के के छिलके से झोला, कप-प्लेट और तिरंगा तक बनाकर पर्यावरण की रक्षा करने और प्लास्टिक का विकल्प ढूंढ निकाला. मोहम्मद नाज को पूसा एग्रिकल्चर कॉलेज के वैज्ञानिक का साथ मिला है. मोहम्मद नाज ने पहले केला, पपीता, बांस और फिर मक्का पर शोध किया और अंत में वो इस निष्कर्ष पर पहुंचे प्लास्टिक के विकल्प के लिए मक्के का छिलका सबसे उपयुक्त है.

नाज ने मीडिया से बात करते हुए कहा, ‘एक किताब में मैंने पढ़ा था कि आज से पचास साल बाद समुद्र में मछलियों से अधिक प्लास्टिक की थैली होंगी. उस दिन मैंने संकल्प लिया कि मैं कोई ऐसा प्रोडक्ट तैयार करूंगा जो प्लास्टिक की जगह ले सके.’ खबर के माध्यम से इस प्रोडक्ट की जानकारी डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद सेंट्रल एग्रीकल्चर यूनिवरसिटी पूसा के वैज्ञानिकों को मिली और वहां के चीफ साइंटिस्ट डॉक्टर मृत्युंजय कुमार मोहम्मद नाज से मिलने उनके घर पहुंचे. पूरी तरह से जांच के बाद डॉक्टर मृत्युंजय ने प्रोडक्ट के साथ कॉलेज बुलाया.

डॉ. मृत्युंजय का कहना है कि मक्का बिहार का एक प्रमुख फसल है. लगभग 8 लाख हेक्टयर में बिहार में मक्के की खेती होती है. किसानों को इससे काफी फायदा होता है और अगर मक्का से कोई ऐसा समान बनाया जाए जो पर्यावरण की रक्षा भी करे और साथ ही नई नौकरियां भी उत्पन्न कर आमदनी बढ़ाने का जरिया बने इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है. वहीं, मोहम्मद नाज के पिता का कहना है कि जब वो नौकरी छोड़ कर घर आया तो पहले लगता था कि यह अपना समय बरबाद कर रहा है लेकिन धीरे-धीरे अब यह लग रहा है कि ये सफल हो जाएगा.

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छपरा के रितेश के एप की गूंज अब अफ्रीका तक, जानिए क्या है इकोवेशन एप

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कहते हैं जब मन में समाज के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो मुश्किल परिस्थितियां भी प्रगति के नये रास्ते खोल देती हैं. छपरा के होनहार छात्र रितेश ने भी अपनी प्रतिभा के बल पर शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने का प्रयास शुरू किया है.  रितेश ने इकोवेशन नामक एक एप बनाया है, जो छात्रों को डिजिटल तकनीक से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने में सहायक साबित हो रहा है. यह एप इतना कारगर है कि बिहार के दो जिलों सारण और बांका में इसके जरिये माध्यमिक स्कूलों में उन्नयन कार्यक्रम चला कर 10वीं के छात्रों को उपयोगी शिक्षा दी जा रही है.

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इकोवेशन एप की सफलता से प्रभावित होकर हाल ही में रितेश को संयुक्त राष्ट्र के एक विशेष समारोह में बुलाया गया, जहां सम्मानित करने के साथ ही अफ्रीका के भी कई देशो में इसे शुरू करने का प्रस्ताव रखा गया. जल्द ही यह एप अफ्रीकी देशों के छात्रों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में अपनी प्रभावी भूमिका निभायेगा. केन्या, नाइजीरिया और कांगो ऐसे कुछ देश हैं, जो प्रथम चरण में इसकी शुरुआत करेंगे.

पढ़ने में कमजोर बच्चों को देख मन में आया था एप बनाने का विचार
छपरा शहर के रहने वाले रितेश सिंह ने 2012 में आइआइटी,दिल्ली से बीटेक किया. जब वह 10वीं में थे तब उनके पिता का देहांत हो गया. इस समय रितेश का मन भी पढ़ने में नहीं लगता था. किताबी भाषा उन्हें जल्दी समझ में नहीं आती थी.  पिता के नहीं रहने के बाद उन्होंने यह तय किया कि अब पढ़-लिखकर ही कुछ अच्छा करना है. उन्होंने आगे की पढ़ाई जारी रखी. इसी बीच उनके मन में पढ़ने में कमजोर बच्चों के लिए एक एप बनाने का विचार आया, जिससे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा आसानी से प्रसारित की जा सके. मध्यमवर्गीय परिवार से होने के कारण एप बनाने में आने वाले खर्च को जुटाना भी इनके लिए एक चुनौती ही थी. हालांकि, दिल्ली में रहने वाले छपरा शहर के कुछ दोस्तों के सहयोग से उन्होंने एप बनाने में सफलता प्राप्त कर ली. आइआइटी के छात्र रहे रितेश ने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के उद्देश्य से बनाया है एप

क्या है इकोवेशन एप
इकोवेशन एप के तहत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक का इस्तेमाल कर बच्चों को शिक्षा दी जा रही है. यह अपने आप में अनोखा एप है. स्कूल में स्मार्ट टीवी पर तो घर में इकोवेशन एप जरिये शिक्षा को बेहतर ढंग से पहुंचाया जा रहा है.  एप बताता है कि क्या पढ़ने से और कैसे पढ़ने से आपको अच्छे अंक आयेंगे और प्रतियोगी परीक्षाओं में कैसे सफल होंगे. यही नहीं, विदेश के भी कई एक्सपर्ट जुड़ कर एप के लिए अपना समय निकाल रहे हैं. ये एक्सपर्ट बच्चों के सवाल का जवाब दे रहे हैं. इस एप में अलग-अलग लर्निंग ग्रुप्स हैं, जिनमें छात्र अपने विषय चुन कर पढ़ सकते हैं. इन छात्रों को दिल्ली से विशेष टीम मॉनीटर करती है.

सीएम ने की थी तारीफ, पूरे राज्य में लागू करने को कहा था
बांका के डीएम कुंदन कुमार ने इस एप के बारे में कहीं इंटरनेट पर पढ़ा और रितेश को बुलाकर इसके बारे में समझा और फिर माध्यमिक स्कूलों में इसके जरिये पढ़ाई शुरू करायी. यह प्रयोग सफल रहा और 2017 में बिहार बोर्ड की मैट्रिक परीक्षा में बांका जिले के परीक्षार्थियों की सफलता का प्रतिशत 38 से बढ़कर 71 हो गया. बिहार के टॉप 20 विद्यार्थियों में तीन बांका से ही थे. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी इस प्रयोग की तारीफ की थी और इसे पूरे राज्य में लागू करने की बात कही थी. बांका की सफलता से प्रभावित होकर सारण में भी वर्तमान में लगभग 100 स्कूलों में इकोवेशन एप के माध्यम से स्मार्ट क्लास संचालित किये जा रहे हैं.

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