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Agriculture

क्रय केंद्र नहीं खुलने व अन्य मांगों को लेकर सड़क पर उतरे किसान

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दलहन फसल के समर्थन मूल्य नहीं मिलने और क्षेत्र में एक भी क्रय केंद्र नहीं खोले जाने से नाराज सैकड़ों किसानों ने कृषि विकास समिति के तत्वावधान में सोमवार को जिले के विभिन्न रेलवे मार्ग एवं सड़क मार्ग को जाम कर आवागमन बाधित कर दिया. किसानों द्वारा रेल और सड़क मार्ग जाम कर दिये जाने से कई ट्रेनें विभिन्न स्टेशनों पर खड़ी रहीं. वहीं, एनएच-80 पर वाहनों की लंबी कतारें लग गयीं.

ड्राइवर से ट्रेन की चाबी लेकर हॉज पाइप को काटा, रेल सेवा बाधित की
चक्का जाम के दौरान किसानों ने बड़हिया स्टेशन पहुंच कर 18184 डाउन टाटा-दानापुर सुपर एक्सप्रेस का हॉज पाइप काट कर ट्रेन के ड्राइवर के पास पहुंचे और इंजन की चाबी ले ली. इतना ही नहीं, पूछताछ कार्यालय और टिकट काउंटर में ताला जड़ दिया. इस कारण रेल का परिचालन अप एवं डाउन में पूर्णत: ठप हो गया. वहीं, लोहिया चौक एनएच-80 पर किसानों ने बैठ कर धरना-प्रदर्शन करते हुए वाहनों का चक्का जाम कर दिया है.

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किसानों ने विभिन्न कार्यालयों में जड़ा ताला, कामकाज ठप
सड़क जाम और बाजार बंद के दौरान किसानों ने प्रखंड के नगर पंचायत कार्यालय, प्रखंड मुख्यालय स्थित सभी कार्यालय, कृषि कार्यालय, बैंक सहित अन्य सभी कार्यालयों में ताला जड़ दिया, जिससे कार्य पूर्णत: ठप रहा. वहीं, बड़हिया बाजार भी पूर्णत: बंद रहा. बाजार बंद करनेवालों में कृषि विकास समिति के अध्यक्ष श्यामनंदन सिंह, संजीव कुमार, राजीव कुमार बबलू, घलटुन सिंह, महेश्वरी सिंह, नवीन सिंह, सुजीत आदि किसानों शामिल हैं.

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अप्रिय घटना को लेकर पुलिस कर रही गश्ती
रेल, सड़क और बाजार बंद के दौरान कोई भी अप्रिय घटना न हो, इसको लेकर पुलिस वाहन गश्ती करते नजर आये. वहीं, बड़हिया रेलवे स्टेशन एसडीपीओ मनीष कुमार सहित अन्य पदाधिकारी दलबल के साथ मौजूद थे.

 

 

Hundreds of farmers, unhappy with not getting the support price of the pulse crop, and opening any purchasing center in the area, blocked the traffic by blocking the various railway lines and roads of the district on Monday under the aegis of the Agriculture Development Committee. Many trains were standing at different stations due to the jamming of rail and road by farmers. At the same time, long lines of vehicles appeared on the NH-80.

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  1. kundan

    November 26, 2018 at 11:18 am

    nice news app

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Agriculture

मधुबनी के सुखराम को मशरूम की खेती ने दी पहचान, खुद लाखों कमाते हैं औरों को भी सिखाते हैं

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बिहार के मधुबनी जिले के किसानों को हर साल बाढ़ और सूखे से लाखों का नुकसान होता है. इन नुकसान को रोकने के लिए सुखराम चौरसिया (35) ने एक तरीका निकला जिससे वो खुद तो लाखों की कमाई कर ही रहे है साथ ही अपने इलाके के और किसानों के लिए एक रोल मॉडल बने हुए है.
सुखराम चौरसिया मधुबनी जिले से करीब 20 किमी. दूर रांटी गांव में रहते है. सुखराम बताते हैं कि पहले हम पारम्परिक खेती (धान, गेंहू, मक्का) ही करते थे. सूखे और बाढ़ के वजह से हर बार नुकसान ही होता था, जितनी लागत लगाते थे उतना भी नहीं निकल पाता था. तब मैंने एक पत्रिका में मशरूम की खेती के बारे में पढ़ा और मशरूम की खेती शुरू की. आज कम जगह और कम पूंजी से अच्छी कमाई हो रही है.


मशरूम की खेती की खूबी की चर्चा करते हुए चौरसिया कहते हैं कि इससे किसान लागत का दुगना फायदा महज चार महीने में आसानी से उठा लेते हैं. भारत में मशरूम उगाने का उपयुक्‍त समय अक्टूबर से मार्च के महीने है. इन छह महीनो में दो फसलें उगाई जाती हैं. शुरू में आने वाली परेशानियों के बारे में चौरसिया ने बताया कि जब मैंने मशरूम की खेती शुरू की तब इलाके के लिए बहुत नई बात थी. उस वक्त अखबारों और पत्रिकाओं में इसकी चर्चा तो होती थी, लेकिन व्यवहारिक धरातल पर इस इलाके के किसानों के बीच इसे लेकर कोई खास उत्साह नहीं था. इससे भी बड़ी समस्या इसके बाजार को लेकर थी. स्थानीय बाजार में इसके खरीदार काफी कम थे. ऐसे में मैंने मशरूम को सुखाकर बाहर भेजना शुरू किया. धीरे-धीरे मुनाफा होने लगा. मेरे साथ ऐसे और लोग भी जुड़ने लगे.

अब सुखराम सूखा और बाढ़ की मार झेलने वाले इस इलाके में पिछले सात वर्षों से मशरूम की खेती कर रहे हैं, साथ ही अपने आस-पास के किसानों को भी प्रशिक्षण दे रहे हैं. अभी हम एक हजार वर्ग फीट से 30 से 35 हजार रूपए कमा रहे हैं. मेरे यहां से प्रशिक्षण लेकर सैकड़ों किसानों ने मशरूम की खेती शुरू कर दी है. कुछ किसान पूरी तरह मशरूम की खेती से जुड़ गए हैं और वे इससे लाखों की कमाई कर रहे हैं. मशरूम की खेती करके मेरी खुद की अलग पहचान बनी हुई है. दूर-दूर के लोग मुझे जानते हैं.

पिछले सात सालों में बाजार में मशरूम की मांग काफी बढ़ गई है. स्थानीय बाजार के साथ बाहर के बाजारों में भी हर वक्त इसकी मांग बनी रहती है. मधुबनी जिला में करीब 100 किसान मशरूम की खेती कर रहे हैं. इनमें से अधिकतर किसान साल के सिर्फ तीन-चार माह ही इसकी खेती करते हैं, जबकि करीब 10 किसान ऐसे हैं जो साल भर मशरूम की खेती करते हैं. सुखराम आगे बताते हैं, “मशरूम की मौसमी खेती करने वाले किसान औसतन 30 से 35 हजार रुपए कमा लेते हैं, जबकि पूरी तरह मशरूम की खेती से जुड़ चुके किसान इससे 1.5 लाख रुपए सालाना तक कमा रहे हैं. कुछ ऐसे किसान भी है, जिनकी आय 2 लाख से 3 लाख रुपए के बीच है.

 

The farmers of Madhubani district of Bihar suffer losses of floods and droughts every year. To prevent these losses, Sukhram Chaurasia (35) turned out to be a way that he was earning millions of rupees himself and also a role model for his area and farmers.

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Agriculture

बोले डिप्टी सीएम खेतों और घरों के लिए अलग होगी बिजली लाइनें

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बिहार के उपमुख्‍यमंत्री सुशील मोदी ने कहा कि अगले दो साल के भीतर खेतों और घरों के लिए अलग-अलग बिजली लाइन होगी. केंद्र ने इसके लिए साढ़े छह करोड़ की राशि स्वीकृत कर दी है. यह बात उन्‍होंने पटना के गांधी मैदान में आयोजित राज्‍य स्‍तरीय कृषि मेेले में कही. कहा कि इसके लिए टेंडर पास किया जा चुका है. खेती के लिए अगले साल के दिसंबर तक हर खेत में बिजली पहुंचा दी जाएगी जिसके बाद किसानों का डीजल पर से निर्भरता खत्म हो जाएगी. साथ ही उन्होंने कहा कि रैयत किसानों को आश्वस्त करते हुए कहा कि जमीन पर उनके हक को बरकरार रखते हुए राज्य और केंद्र सरकार ऐसी व्यवस्था करेगी कि बटाइदारों को भी सरकार की विभिन्न अनुदान योजनाओं का लाभ मिल सके.


गांधी मैदान में गुरुवार से शुरू हुए 8वां चार दिवसीय राज्यस्तरीय कृषि यांत्रिकीकरण मेला में देश-विदेश के कृषि यंत्र निर्माता भाग ले रहे हैं. मेला का मुख्य आकर्षण छोटे किसानों एवं सब्जी उत्पादकों के लिए मोबाइल कोल्ड स्टोरेज है. अनुदानित दर पर किसान इस प्रकार के कोल्ड स्टोरेज स्थापित कर सकते हैं.


इस मौके पर उपमुख्यमंत्री ने बताया कि इस साल 16 राज्‍यों के कृषि यंत्र कंपनियां यहां शिरकत कर रही है. अगले साल से विदेशी कंपनियां भी शिरकत करेगी. राज्य सरकार कांट्रेक्ट फार्मिंग के लिए नियम बना रही है. उन्होंने इस बात पर भी जोर डाला कि जैसे-जैसे शिक्षा का प्रसार होगा लोगों की आमदनी बढ़ेगी, खेती करने वाले मजदूरों की कमी होगी, जो किसान खेती के लिए यांत्रिकरण को अपनाएंगे उन्हें आने वाले दिनों में परेशानी नहीं होगी.

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Agriculture

#Agriculture: यूं करें लहसुन की खेती..तो होगी बेहतर पैदावार

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यूं करें लहसुन की खेती..तो होगी बेहतर पैदावार

लहसुन वैसे तो तामसी भोजन माना जाता है लेकिन लेकिन उन महत्वपूर्ण फसलों में से एक है,जो स्वाद तो बढ़ाता ही है, साथ ही य​ह कई तरह के औषधी के रूप में भी प्रयोग होता है। इसका उपयोग मसाले के रूप मे भी किया किया जाता है। लहसुन के मिश्रित गांठ जिसे आम बोलचाल की भाषा में पोट भी कहा जाता है में कई छोटे बुलबुले या लौंग होते हैं। जानकारों की माने तो लहसुन में एंटीबायोटिक पदार्थ होते हैं ,जो कुछ जीवाणु और कवक के प्रभाव को रोकते हैं।लहसुन की खेती उत्तर प्रदेश ,मद्रास के आसपास के इलाकों के साथ ही गुजरात में उगाया जाता है।

किस तरह की मिट्टी लहसुन के लिए उपयोगी

वैसे तो लहसुन विभिन्न प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है। लेकिन वैज्ञानिकों की राय है कि इसके वाणिज्यिक उत्पादन के लिए सैंडिलेट और लोम की तरह की मिट्टी काफी उपयोगी है। सुसा शोज़ प्रकार की मिट्टी वैसी उपजाऊ मिट्टी है ​जो कार्बनिक पदार्थो से परिपूर्ण होता है, कार्बनिक पदार्थों में समृद्ध होता है, और फसल के दौरान यह जमीन में पर्याप्त नमी बनाये रखने की दृष्टि से काफी उपयोगी है।

लहसुन की खेती नमी युक्त जलवायु वाले क्षेत्रों में सही तरीके से बढ़ती हैं। लहसुन की बुवाई के लिए उचित समय मई से अक्टूबर तक है। अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में लहसुन की फसल अच्छी तरह से नहीं बढ़ता है।

लहसुन की उन्नत प्रजातियाँ

गोदावरी – जामनगर संग्रह से एक से विकसित और 1997 में जारी किया गया। बल्ब रंग में गुलाबी और आकार के हिसाब से मध्यम हैं। 25से 30 लौंग प्रति बल्ब पैदा करने वाली यह प्रजाति एरीओफाईट के कीटों को सहन कर सकता है.इसके तैयार होने की अवधि 130 से 140 दिन है। औसत उपज प्रति हेक्टेयर 150 क्विंटल है।

लहसुन की उन्नत प्रजातियाँश्वेता -1987 में जारी की गयी लहसुन की यह प्रजाति गुजरात के एकत्र किये गए जर्मप्लास्म से तैयार की गयी है। इसके बल्ब /कंद मध्यम आकर के होते है और औसतन 120 से 130 दिन में तैयार हो जाते है। इस प्रजाति की अवसत पैदावार १३० क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।

लहसुन की खेती में बीज दर और बीज बोने का समय: –
लहसुन की बीज दर में 315 से 500 लौंग प्रति हेक्टेयररखी जाती है। लहसुन की खेती अगस्त-नवंबर के बीच की जाती है।

लहसुन खेती में रोपण सामग्री: –
मध्यम से बड़े लौंगों के पूरी तरह परिपक्व बल्ब को रोपण सामग्री के रूप में चुना जाना चाहिए। ये रोगों और यांत्रिक क्षति से मुक्त होना चाहिए। भूमि के हेक्टेयर में बल्ब के आकार और रोपण की दूरी के आधार पर लगभग 400-700 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होगी।

लहसुन खेती में लौंग / बीज की तैयारी विधि:
– एक दूसरे से लौंग को अलग करके रोपण सामग्री तैयार की जाती है। बल्ब के बाहरी हिस्सों को (लौंग) सबसे अच्छी रोपण सामग्री माना जाता हैं। बड़े बल्ब में 10-14 लौंग होते हैं जब रोपण सामग्री की कमी होती है, तो आंतरिक लौंग भी इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन इन्हें बाहरी लौंग से अलग किया जाना चाहिए। बीज बोने वाले कीटनाशकों और रोगों से छुटकारा पाने के लिए कम से कम दो घंटे के लिए पौधों की सामग्री फिर से कीटनाशक-कवकनाशी समाधान में भिगोई जाती है। लौंग लगाए जाने से पहले लौंग को हवा में सूख जाना जरुरी है।

रोपण का सर्वश्रेष्ठ सत्र: –
लहसुन खेती में, लहसुन के लिए रोपण अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न होता है। बारिशवाले ऊपरी इलाकों में, रोपण आमतौर पर सितंबर के शुरुआती भाग के दौरान किया जाता है। अन्य निचला क्षेत्रों में, रोपण अक्टूबर से नवंबर तक का समय आदर्श माना जाता है. दिसंबर माह में किया गया रोपण, छोटे-छोटे बल्बों का उत्पादन करता है. जिससे थ्रिप्स और कणों की उपजी होती है, और कभी-कभी जल्दी बारिश से बल्ब प्रभावित होते हैं।

लहसुन खेती में रोपण दूरी: –
रोपण की दूरी 15 सेमी x 15 सेमी से 20 सेमी x 10 सेमी से 25 सेमी तक भिन्न होती है। झाड़न या मध्याह्न की छड़ी का उपयोग करके लगाया जाता है ताकि मिट्टी में दो-तिहाई लंबाई खड़ी हो या लगभग 2 सेमी से 3 सेंटीमीटर गहरी हो।
लहसुन खेती में रोपण दूरीलहसुन खेती में खर-पतवार निवारण : – बुवाई के एक महीने बाद पहली बार लहसुन के खेत में हाथ या खुर्पी की सहायता से खर पतवार दूर किया जाता है । पहली बार खर -पतवार साफ़ के बाद एक महीने बाद चक्र खर पतवार निस्तारण का आयोजित किया जाता है। जोशी के अनुसार (1 9 61) कटाई, बुवाई के 2—4 महीने बुवाई से पहले फसल), मिट्टी को ढीला करने के साथ ही बड़ी और अच्छी तरह से भरी हुई बल्बों की स्थापना में मदद करता है। लहसुन फसल को बाद के दिनों में गुड़ाई निराई नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि यह स्टेम को नुकसान पहुंचा सकता है और अंकुरण की रखरखाव की गुणवत्ता को कम कर सकता है ,और पहले से ही बने हुए लौंग को कम कर सकता है।

लहसुन खेती में सिंचाई / जल आपूर्ति: – रोपण के लिए तैयारी में, यदि मिट्टी की नमी पर्याप्त नहीं है, तो यह क्षेत्र एक या दो दिन पहले सिंचाई करना जरूरी है यदि सिंचाई के बाद मिट्टी बहुत गीली हो जाती है, तो जब तक वांछित नमी का स्तर प्राप्त नहीं हो जाता है, तब तक खेती को सूखने दिया जाना चाहिए। । लहसुन प्रति पौधों की औसत 7 जड़ों का उत्पादन करता है। सिंचाई की आवृत्ति बढ़ती अवधि के दौरान मिट्टी के प्रकार और वर्षा पर निर्भर करती है।है। मिट्टी पर दरारें या दरारें दिखाई देने पर फ्लैश सिंचाई लागू की जा सकती है। जल को छह घंटे से परे क्षेत्र में रहने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। रोपण से पहले सिंचाई शुरू होती है और रोपण के 70-85 दिन बाद समाप्त होता है।

लहसुन खेती में खाद और उर्वरक: –

25 से 30 गाड़ी कम्पोस्ट सही अनुपात में बुआई से पहले खेत तैयार करते समय डाले l लहसुन में, अकोला की सिफारिश 50 किलो एन, 50 किग्रा पी 2ओ 5 और 50 किलोग्राम किलो के 2ओ डाला जाना चाहिए। 50 किलोग्राम नाइट्रोजन को साइड ड्रेसिंग के रूप में बुवाई के एक महीने बाद फसल में डाला जा सकता है।

लहसुन खेती में खाद और उर्वरकलहसुन खेती में कीट और रोग नियंत्रण: – थ्रिप्स (थ्रीप्स एसपी)। पौधों पर दोनों नींफ्स और वयस्क फ़ीड करते हैं। वे छोटे पत्तों से बढ़ते अंक तक पौधे के रस को चूसते हैं। पुराने पत्ते सूखे या दिखने में छिद्रदार हो जाते हैं।

नियंत्रण – थ्रिप्स लहसुन की फसल को आमतौर पर जनवरी से मार्च ज्यादा प्रभावित करते है थ्रिप्स से बचाव के लिए जल्दी बुवाई की सलाह दी जाती है प्रारंभिक रोपण, संभवत: अक्टूबर में करने से थ्रिप्स का प्रभाव कम हो जाता है। मैलाथियन, फइप्रॉनिल, एथोन जैसे रसायनों के छिड़काव सामान्य रोग नियंत्रण प्रक्रिया में से एक हैं।

कण (एसीरिया ट्यूलिप): कीट या तो बीज से पैदा होते है या गीली घास से पैदा होते है। प्रभावित पौधे पत्तियों पर पीले या हल्के हरे रंग की धारियों उभर कर दिखती है साथ ही पत्ते मुड़ और विकृत हो जाते हैं। पत्ते आसानी से लौंग से उभरकर नहीं आते हैं और उभरने के पश्चात पत्तियों से अलग हो जाते हैं। क्षति को “टेंगल टॉप” कहा जाता है।

नियंत्रण: बीज के टुकड़ों के उपचार के लिए, कीड़े के नियंत्रण के लिए, कृषि वैज्ञानिको से सलाह करके रसायनों को इस्तेमाल करें। जब तक कीट नियंत्रित नहीं हो जाता है तब तक 10 दिनों के अंतराल तक छिड़काव दोहराते हैं।

लहसुन की कटाई और पैदावार: – लहसुन 4-5 महीने की अवधि की फसल है। जब पत्तियों पीले और भूरे रंग के ट्यूरिंग शुरू हो जाते हैं और सूखने के लक्षण दिखते है तो फसल तैयार मन जाता हैं। आमतौर पर बीज के उद्भव के लिए एक महीने का समय लगता है। उसके बाद उसकी सोहनी की जाती है। तत्पश्चात जब फसल तैयार होता है और डंठल सूखने लगते हैं तो उसकी कोड़ाई कर छोटे बंडलों में बांध कर छाया में 2-3 दिनों के लिए सूखने के लिए रखा जाता है ताकि बल्ब कठोर हो और उनकी गुणवत्ता लंबे समय तक बनी रहे। बल्बों को बांस क्र डंडो पर रखकर या सूखी तल पर एक अच्छी हवादार कमरे में फर्श पर अथवा सूखी रेत पर रखा जा सकता है। लहसुन की पैदावार 50 से 70 क्विंटल / हेक्टेयर उपज प्राप्त होता है।

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