आधुनिक शिक्षा के दौर में नि:शुल्क वैदिक युगीन शिक्षा ही काशी वेद वेदांग विद्यापीठ का मूल उद्देश्य

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मानव सन्तान को शिक्षित करने के लिए एक पाठशाला या विद्यालय की आवश्यकता होती है. बच्चा घर पर रह कर मातृ भाषा तो सीख जाता है परन्तु उस भाषा, उसकी लिपि व आगे विस्तृत ज्ञान के लिए उसे किसी पाठशाला, गुरुकुल या विद्यालय मे जाकर अध्ययन करना होता है. केवल भाषा से ही काम नहीं चलता अपितु अनेक विषय हैं जिनका ज्ञान गुरुकुल, पाठशाला या विद्यालय में कराया जाता है.

शिक्षा पद्धति की चर्चा आने पर आजकल मुख्य रूप से पब्लिक स्कूल पद्धति प्रचलित है जहां बच्चे को प्रायः अंग्रेजी भाषा के माध्यम से अध्ययन कराया जाता है और इसी भाषा के माध्यम से उसे गणित, साइंस व कला की शिक्षा दी जाती है. इंटर या ग्रेजुएशन करले ने पर वह इंजीनियरिंग, मेडीकल साइंस आदि अपने इच्छित विषय को लेकर व्यवसायिक कोर्स या स्नातक व स्नातकोत्तर उपाधियां प्राप्त कर सकता है जिसके बाद उसे रोजगार मिल जाता है और वह सुख-सुविधा पूर्वक जीवन व्यतीत करता है. दूसरी शिक्षा पद्धति हमारी प्राचीन गुरुकुलीय पद्धति है. गुरुकुल का उद्देश्य बालक का शारीरिक, बौद्धिक, मानसिक व आत्मिक सर्वागीण विकास करना होता है.

काशी में एक ऐसा ‘गुरुकुल’ भी है जो आधुनिकता की आबोहवा के बीच वैदिक युगीन शिक्षा और गुरु-शिष्य परंपरा की मिसाल है. पिछले कई वर्षों से इस केंद्र में देश के विभिन्न राज्यों के 8 से 11 वर्ष तक के बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं.
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, जगतगंज के सामने स्थित काशी वेद वेदांग विद्यापीठ एंव ज्योतिष शोध संस्थान में शिक्षा के साथ ही छात्रों को सुयोग्य गुरु के सानिध्य में दीक्षा भी दी जाती है. यहां के विद्यार्थियों को प्रतिदिन आचार्या के कुशल निर्देशन में वेद, पूजा-पाठ, ज्योतिष विज्ञान आदि की शिक्षा दी जाती है. इन्हें प्रथमा, मध्यमा से लेकर शास्त्री आचार्य तक की शिक्षा दी जाती है.

विद्यार्थियों को वेदों के सस्वर पाठ का भी नियमित अभ्यास कराया जाता है. खासियत यह है कि यहां सिर्फ आठ से 11 आयु के बच्चों का ही प्रवेश लिया जाता है. सामूहिक मंत्रपाठ, हवन-पूजन, योगासन की कक्षाएं चलती हैं. प्रत्येक मध्यमा में 35 बच्चों के ही शिक्षा, रहने-खाने, वैदिक पोशाक आदि की व्यवस्था विद्यापीठ की जिम्मेदारी है.

राम नारायण सेवा संस्थान के द्वारा संचालित विद्यापीठ के मुख्य आचार्य किशोर झा जी का कहना है कि शिक्षा प्रणाली में गुरु-शिष्य सानिध्य गुरुकुल में रहकर ही हो सकता है. शिष्य का यह दायित्व है कि वह आचार्य के बताए मार्ग का अनुसरण करे. इस समय शिक्षा के अधिकांश केंद्र अर्थ प्रधान हो गए हैं. ऐसे में वहां विद्या दायित्व का बोध कम ही दिखता है. शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वह दायित्वों का सजगता पूर्वक निर्वहन करें.

दिनचर्या : गुरुकुल की दिनचर्या में कड़ा अनुशासन होता है. जैसे, प्रात: 5 बजे प्रार्थना, स्नान, सूर्यनमस्कार, योगासन, गायत्री मंत्र का जप इत्यादि कृत्य होते हैं. तदुपरांत दिन में पाठ होते हैं. तत्पश्चात् विश्राम कर पुन: पाठ होते हैं. सूर्यास्त से दस-पंद्रह मिनट पूर्व अध्ययन बंद करते हैं. तदुपरांत संध्या स्तोत्र पठन एवं थोड़ा सा उपाहार. विश्राम, अध्यन-अध्यापन.

आर्थिक सहायता: हमारा शिक्षण संस्थान कभी भी शासन की सहायता पर निर्भर नहीं रही एवं आज भी नहीं हैं. समाज के व्यक्ति ही उन्हें धन देते हैं एवं ऐसा कर वे स्वयं को कृतार्थ मानते हैं. शासन कभी शिक्षा प्रणाली अथवा संस्थानों में हस्तक्षेप नहीं करता था. हमारी प्राचीन राजनीति तथा शासन प्रणाली का यह दंडक होता था. शिक्षा क्षेत्र पूर्णतः स्वायत्त होता था.

सनातन और वैदिक शिक्षा के माध्यम से अपने बच्चों के सर्वागीण विकास के साथ-साथ समाज और देश के विकास की सोच रखने वालों के लिए काशी वेद वेदांग विद्यापीठ के कार्यालय पंचशील अपार्टमेंट, विवेकानंद कॉलोनी, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के सामने, जगतगंज, वाराणसी या दूरभाष संख्या 01204593661, 06391913131 पर संपर्क कर सकते हैं.

 

 

There is also a ‘Gurukul’ in Kashi, which is an example of Vedic age education and Guru-disciple tradition between the climate of modernism. For the last several years, children from 8 to 11 years of various states of the country are studying in this center.
With the education of Kashi Ved Vedang Vidyapeeth and Astrology Research Institute located in front of the entire Sanskrit University, Jagatganj, students are also given diksha in the connivance of a qualified guru.

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