यह 5 वजह हैं जिससे पूर्वोत्तर राज्यों ने कमल को दिया खिलने

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देश के 19 राज्यों पर खिल चुके कमल की निगाह पूर्वोत्तर की सेवन सिस्टर स्टेट पर उगने का लक्ष्य पूरा होने जा रहा है. असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में के​सरिया रंग खिलने के बाद मोदी सेना का लक्ष्य त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में केसरिया पताका लहराने का था. ऐसा होता बदलती हुई राजनीति संकेत दे रही है. तीन राज्यों के चुनावी नतीजे इसकी बानगी है कि पूर्वोत्तर राज्यों में बीजेपी के पैर, अन्य पार्टियों के मुकाबले तेजी से फैले. आइए जानते हैं कि आखिर क्या वजह है कि पूर्वोत्तर राज्यों में लोगों की पसंद कमल का निशान बनता जा रहा है.

कांग्रेस के प्रति अविश्वास : 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से कांग्रेस की हार का सिलसिला बदस्तूर जारी है. हालांकि इस बीच कांग्रेस को छोटी-मोटी कामयाबी जरूर मिली.परंतु लोगों में देश की सबसे पुरानी पार्टी के प्रति लोगों का रुझान कम होता चला जा रहा है. पूर्वोत्तर में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला. मेघालय में कांग्रेस जरूर सम्मानजनक स्थिति में है लेकिन इस पर पार्टी को आत्मविश्लेषण की जरूरत है. बीजेपी ने कांग्रेस को छोड़ने वालों को पार्टी में शामिल कर मैदान में उतारा और उन्होंने जीत दिलवाई. परंतु कांग्रेस ने उनका सही इस्तेमाल नहीं किया.
चीन का डर : पूर्वोत्तर के लोगों ने बीजेपी को बढ़त देकर भारत सरकार के प्रति अपना विश्वास जताया है. इसकी सबसे बड़ी वजह है चीन की बढ़ती दखलअंदाजी. इसका सामना करने के लिए उनको भारत सरकार की सरपरस्ती की जरूरत है. उनका मानना है कि जो तिब्बत के साथ चीन ने किया वैसा उनके साथ हो सकता है. अगर वे म्यांमार के साथ गए तो वहां अल्पसंख्यकों के साथ हुए सलूक को देख चुके हैं. बांग्लादेश के चटगांव में आदिवासियों के साथ जो सलूक हुआ वे किसी से नहीं छुपा. ऐसे में पूर्वोत्तर वासियों ने बीजेपी पर भरोसा जताना शुरू किया है.

ध्रुवीकरण : भारतीय जनता पार्टी को कभी हिंदी प्रदेश पार्टी कहा जाता था. त्रिपुरा जैसे राज्य में उसको कामयाबी मिलना नए सियासी समीकरणों की ओर इशारा करता है. राजनीतिक विश्लेषकों ने त्रिपुरा के संदर्भ में बात करते हुए कहा कि त्रिपुरा एक संवेदनशील राज्य है. यहां बांग्लादेशी और आदिवासियों के बीच टकराव बना रहता है. बीजेपी ने इस टकराव को समझते हुए बांग्लादेशी खेमें पर अपनी पकड़ बनाई और ध्रुवीकरण की स्थिति पैदा हुई. इसका फायदा बीजेपी ने हाथों हाथ बटोर लिया.

असम में मिली जीत : साल 2016 में बीजेपी ने असम में कांग्रेस को बड़े फर्क से हराया था. उत्तर पूर्वी राज्यों में पैठ बनाने की कोशिश कर रही बीजेपी के लिए यह महत्वपूर्ण मौका था. असम में मिली जीत के बाद बीजेपी ने दूसरी पार्टियों के नाराज नेताओं को खोजना शुरू किया. असम में उनको हेमंत बिस्वा का साथ मिला था. जिसके बाद बीजेपी असम में जीत की इबारत लिख पाई थी. एक वक्त में हेमंत पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के करीबी माने जाते थे. चुनाव से ठीक पहले वह कांग्रेस से बीजेपी में आकर मिल गए थे. हेमंत उत्तर पूर्वी राज्यों में कांग्रेस की ताकत से बखूबी वाकिफ हैं. उन्हें कांग्रेस की कमजोर नब्ज की भी जानकारी है. हेमंत के संपर्क के बदौलत ही सीपीआई और टीएमसी नेताओं ने बीजेपी में जाना शुरू किया और असर दिखाई दे रहा है.

पिछड़ापन: पूर्वोत्तर के लोगों खुद को भारतीय मानते हैं लेकिन उनके अंदर एक प्रकार का संशय है. उनको लगता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की मूल धारा में वह नहीं आते, लेकिन समस्या यह है कि उनके पास विकल्प ही कम है. बड़े शहरों में पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों की बढ़ती संख्या इस बात की सूचक है कि वहां के जमीनी हालात ठीक नहीं है. ऐसे में जनता नए विकल्प की तलाश कर रही है और बीजेपी को एक मौका दिया गया है.

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