कुंभकर्ण राक्षस जरूर था लेकिन अधर्म से दूर ही रहता था कुंभकर्ण से जुडी कुछ रोचक बातें

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ब्रह्मा जी ने दिया था छः महीने सोने का वरदान

रावण, विभीषण और कुंभकर्ण भाईयों ने ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी प्रकट हुए तो कुंभकर्ण को वरदान देने से पहले चिंतित थे।

इस संबंध श्रीरामचरित मानस में लिखा है कि-

पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ।

इसका अर्थ है कि रावण को मनचाहा वरदान देने के बाद ब्रह्माजी कुंभकर्ण के पास गए। उसे देखकर ब्रह्माजी के मन में बड़ा आश्चर्य हुआ।

 कुंभकर्ण को नारद ने दिया था तत्वज्ञान

कुंभकर्ण को पाप-पुण्य और धर्म-कर्म से कोई लेना-देना नहीं। वह हर 6 माह में एक बार जागता था। उसका पूरा दिन भोजन करने और सभी का कुशल-मंगल जानने में व्यतीत हो जाता था। रावण अधार्मिक कार्यों में उसका कोई सहयोग नहीं होता था। कुंभकर्ण राक्षस जरूर था, लेकिन अधर्म से दूर ही रहता था।

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