बांग्ला का एक हिस्सा कैसे बना बिहार, जानिए पूरी कहानी

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ब्रिटिश शासन में बिहार बंगाल प्रांत का हिस्सा था, जिसके शासन की बागडोर कलकत्ता में थी। हालांकि इस दौरान पूरी तरह से बंगाल का दबदबा रहा लेकिन इसके बावजूद बिहार से कुछ ऐसे नाम निकले, जिन्होंने राज्य और देश के गौरव के रूप में अपनी पहचान बनाई। इसी सिलसिले में बिहार के सरन जिले के जिरादेई के रहने वाले डॉ. राजेंद्र प्रसाद का नाम आता है। वह भारत के पहले राष्ट्रपति बने।

1912 में बंगाल प्रांत से अलग होने के बाद बिहार और उड़ीसा एक समवेत राज्य बन गए, जिसके बाद भारतीय सरकार के अधिनियम, 1935 के तहत बिहार और उड़ीसा को अलग-अलग राज्य बना दिया गया। 1947 में आजादी के बाद भी एक राज्य के तौर पर बिहार की भौगौलिक सीमाएं ज्यों की त्यों बनी रहीं। इसके बाद 1956 में भाषाई आधार पर बिहार के पुरुलिया जिले का कुछ हिस्सा पश्चिम बंगाल में जोड़ दिया गया।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक तरह से बिहार का पुनरुत्थान हुआ। बिहार से ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की। गांधी जी के पहले आंदोलन की शुरुआत भी चंपारण से ही हुई। अंग्रेजों ने गांधी जी की बिहार यात्रा के दौरान उन्हें मोतीहारी में जेल भी भेज दिया था।

आजादी के बाद जयप्रकाश नारायण के छात्र आंदोलन को कौन भुला सकता है। जेपी आंदोलन न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे देश को साथ लेकर चला। बिहार की राजनीति और सामाजिक स्थिति में इसके बाद काफी बदलाव हुए। कांग्रेस से सत्ता बिहार की क्षेत्रीय पार्टियों के हाथों में आई। एक गरीब परिवार में जन्में लालू प्रसाद यादव लगातार 15 साल तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। इस दौर में कुछ सामाजिक बदलाव जरुर हुए लेकिन इस दौरान  विकास और अर्थव्यवस्था का ग्राफ गिरता ही गया। प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव और राजद के शासन के लंबे सिलसिले को तोड़ा।

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