जानिए कैसे एक विश्वविद्यालय के नाम पर पड़ा शहर का नाम?

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6वीं शताब्दी में भारत की शान मानें जाना वाला बिहार का नालांदा विश्वविद्यालय विश्व धरोहर माना जाता है। देश-विदेश से छात्र व शिक्षक पढ़ने और शिक्षा के क्षेत्र में नए अवसर प्राप्त करने आते थे। एक दम अनोखे ढ़ंग व हजारों एकड़ में पहला ये विश्वविद्यालय था, जहां पर पूरे विश्व के छात्र एकत्रित होकर एक-दूसरे की सभ्यता को जानते थे। इस विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ने 450-470 ई. के बीच की थी। पटना से 88.5 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व और राजगीर से 11.5 किलोमीटर उत्तर में स्थापित इस विश्वविद्यालय में उस समय लगभग 12 हजार तक छात्र और 2 हजार तक शिक्षक हुआ करते थे। इसे अपने आप में एक उपब्लिध के तौर पर देखा जा सकता है।

यह प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था। कई देशों के छात्रों को एक साथ इकट्ठा करने का एक नयाब तरीका अलेक्जेंडर कनिंघम ने निकाला था। इस महान विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके वैभव का एहसास करा देते हैं। यह विश्व का सिर्फ ना सबसे बड़ा शिक्षा का केंद्र था बल्कि प्रथम पूर्णतः आवासीय भी था। नालंदा के विशिष्ट शिक्षाप्राप्त स्नातक बाहर जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करते थे। इस विश्वविद्यालय की नौवीं शती से बारहवीं शती तक अंतरराष्ट्रीय ख्याति रही थी।

एक पुरानी कहवात है किसी भी सुंदर वस्तु की रचना हुई है तो उसका अंत भी अवश्य होता है। शायद नालंदा के भविष्य में काली स्याही से ऐसा ही लिखा था। तुर्क लुटेरे बख्तियार खिलजी ने 1199ई. में इस विश्व धरोहर को एक झटके में आग के हवाले कर दिया और लगभग राख में ही तब्दील कर दिया, यहां बने पुस्तकालय के भव्य होने का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आग कि चपेट में आने के बाद 3 माह तक वो जलती रही, वर्तमान समय में भी इसका एहसास यहां पर देखा जा सकता है।

आखिरकार क्यों किया खिलजी ने ऐसा

इतिहास के पन्नों को पलट कर देखे तो पता चलता है कि खिलजी ने नालंदा को तबाह करने के पीछे उसकी बिमारी थी। इतिहास के पन्नों के मुताबिक खिलजी एक बहुत ज्यादा बीमार पड़ गया, तमाम हकीमों से इलाज करने के बावजूद जब वो ठीक नहीं हुआ तो किसी शख्स के राय देने पर नालंदा के आयुर्वेद विभाग में आया और किसे किस्मत कहें या वक्त खिलजी ठीक भी हो गया। खिलजी को जितनी खुशी अपने ठीक होने की थी, उससे कहीं ज्यादा दुख उसे आयुर्वेद पर विश्वास करने का था। बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने व वैद्य को पुरस्कार देने के बदले बख्न्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग लगवा दिया। यही नहीं, उसने अनेक धर्माचार्यों और बौद्ध भिक्षुओं को मार डाला।

बता दें कि नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विख्यात केंद्र था। प्रवेश परीक्षा अत्यंत कठिन होती थी। अत्यंत प्रतिभाशाली विद्यार्थी ही प्रवेश पा सकते थे।

भारत अपने आप में है खास

विभिन्नताओं के देश भारत में एक खास बात ये है कि जब हमारे बड़े बुजुर्ग दुनिया को अलविदा कह जाते हैं तो हम उनकी याद में अकसर मूर्तियां या फिर कुछ ऐसा जरूर बनवाने की कोशिश करते हैं ताकि उनका नाम अमर हो जाए। ठीक इसी तरह नालंदा विश्वविद्यालय का नाम इतिहास के पन्नों में अमर रहे इसलिए बिहार में एक शहर का नाम नालंदा रखा गया।

सुधर रहे हैं हालात

विश्व स्तर पर नालंदा दोबारा अपने अस्तित्व के लिए लड़ाई लड़ रहा है और देश-विदेश से छात्रों को कई तरह के कोर्स करने के लिए अपनी ओर आकर्षित कर रहा है।

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